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Supari Wale Super Ganesh: आमतौर पर सुपारी खाने के लिए उपयोग में लिया जाता है, लेकिन रीवा के कलाकार की मूर्ति निर्माण देख दंग रह जाएंगे. इसे खरीदने के लिए लोगों में होड़ रहती है.
आपने मिट्टी से संगरमर से अलग अलग धातुओं से बने हुए गणेश जी को देखा होगा. लेकिन मध्यप्रदेश के रीवा में खाने वाली सुपारी से गणेश जी मूर्तियों का निर्माण किया जा रहा. और यह कला काफी मशहूर है.

आपने पत्थर, संगमरमर, लकड़ी और धातुओं से बनी कई प्रकार की कलाकृतियों को देखा होगा, लेकिन क्या आपने कभी सुपारी से बनी कलाकृतियों को देखा है? क्या आपने सोचा है कि पान या जर्दे के साथ खाने वाली सुपारी की भी कलाकृतियां बनाई जा सकती हैं?सुपारी एक ऐसी वस्तु है जो देश के बड़े हिस्से में पाई जाती है. अधिकतर लोग यह जानते हैं कि सुपारी केवल खाने की वस्तु है, लेकिन रीवा के कुंदेर परिवार के लोग सुपारी से कई तरह के मूर्ति का निर्माण करते है. इनके यहां सुपारी से बनाई गई गजानन की मूर्ति खूब पसंद की जाती है.

सुपारी की कलाकृति से राधा कृष्ण की मूर्ति के अलावा रीवा का ये विशेष कुंदेर परिवार भगवान गणेश की मूर्ति को आकार देता है. सुपारी की अलग अलग कलाकृति बना कर भगवान गणेश के अंग, आभूषण, और वस्त्र तैयार किए जाते है. इन कलाकृतियों में चमक लाने के लिए तैयार की गई गणेश जी की मूर्ति में पॉलिश की जाती है. रीवा शहर सुपारी की कलाकृति के लिए विश्व प्रसिद्ध है.

रीवा में कुंदेर परिवार के द्वारा संचालित ऐसी कई दुकानें है जो पीढ़ियों से सुपारी के खिलौने और मूर्तियों का न सिर्फ निर्माण करते आरहे है. बल्कि इस कला को महंगाई के दौर में जीवित भी रखा गया है. सुपारी की मूर्तियों का इतिहास भी काफी पुराना है. इस कला की शुरुआत वर्ष 1942 में सुपारी से सिंदूर की डिब्बी बनाने से हुई थी.

यह डिब्बी राज परिवार के लिए बनाया गया था. आज सबसे ज्यादा सुपारी से गणेश जी की मूर्ति बनाई जा रही है. इस वर्ष भी गणेश उत्सव के दौरान इनके यहां से काफी संख्या में सुपारी से बने हुए गणेश जी खरीदे गए है.इतना ही नहीं रीवा से दूर दूर तक इन मूर्तियों की सप्लाई होती है. पूरे देश से इन मूर्तियों को बनाने के लिए ऑर्डर मिलते है.

रीवा के अवधेश और दुर्गेश नाम के दो कलाकारों से मिलेंगे तो आप बरबस ही कह पड़ेंगे कि सुपारी से तो अपनी मनचाही वस्तु बनाई जा सकती है. दरअसल रीवा में रहने वाला कुंदेर परिवार आधी सदी से भी अधिक समय से सुपारी से तरह-तरह की मूर्तियां और खिलौनी जैसी चीजें बनाता रहा है. इनकी कला को राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री तक सराह चुके हैं.

बात 1942 की है. रीवा के फोर्ट रोड में भगवान सिंह कुंदेर का परिवार रहता था. भगवान के बेटे राम सिया लकड़ी के खिलौने बनाते थे.<br />हुआ यूं कि रीवा के महाराज गुलाब सिंह पान खाने के शौकीन थे लेकिन सुपारी उनके दांतों में लग जाया करती थी. जिसके बाद महाराज ने कुंदेर परिवार को हुक्म दिया कि वे सुपारी को इस तरीके से काटें कि वो मुंह में न लगे. इसी दौरान जब राम सिया ने सुपारी को भिगो कर काटा और महाराज के सामने पेश किया तो बेहद खुश हुए.<br />इसी दौरान राम सिया ने सुपारी से कुछ अलग करने का सोचा.सबसे पहले उन्होंने सुपारी से सिंदुर की डिब्बी बनाई और महाराज के सामने इसे भी पेश किया. जिससे खुश होकर महाराज ने 51 रुपये का इनाम दिया था. इसके बाद राम सिया ने सुपारी से चाय के सेट से लेकर ताजमहल तक अनगिनत चीजें बनाईं

साल 1960 में तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद रीवा आए उन्हें सुपारी से बनी वर्किंग स्टिक कुंदेर परिवार ने दी. इसके बाद 1969 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी रीवा आई उन्हें तोहफे के रुप में सुपारी का टी सेट दिया गया. इसके बाद तो सिलसिला चल निकला. तब से अब तक रीवा आने वाले हर आम और खास को तोहफे में सुपारी के गणेश जी और खिलौने ही दिए जाते हैं..

महाराजा के आदेश पर राज दरबार के लिए लच्छेदार सुपारी काटी जाने लगी, उसी सुपारी को सुन्दर आकार देकर भगवानदीन कुंदेर ने सिंदूर की डिब्बी बनाई और महाराजा गुलाब सिंह को भेंट की. उस समय भगवानदीन को दरबार में लच्छेदार सुपारी काटे जाने पर राज परिवार की ओर से 51 रुपये का इनाम दिया गया था, समय के साथ बाजार की मांगों के अनुसार सुपारी की मूर्तियां बनाई जाने लगीं, तब से लेकर आज तक सुपारी की मूर्तियों और खिलौने को बनाने की जिम्मेदारी भगवानदीन कुंदेर की पीढ़ी निभा रही हैं, और यह जिम्मेदारी अब दुर्गेश और अवधेश कुंदर पर है.