OMG! संगीत सुन फसल दे रही ज्यादा उत्पादन, वैज्ञानिकों ने म्यूजिक थेरेपी को…

OMG! संगीत सुन फसल दे रही ज्यादा उत्पादन, वैज्ञानिकों ने म्यूजिक थेरेपी को…


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Agriculture News: यह प्रयोग हम कई साल से कर रहे हैं. अलग-अलग फसलों पर अलग-अलग एक्सपेरिमेंट करके भी हमने देखे हैं. हमने पाया कि जिस खेत में फसल को म्यूजिक सुनाया गया, वह फसल 10 से 15 दिन पहले ही मैच्योरिटी पर आ गई और उसकी हेल्थ में भी बहुत बड़ा फर्क पड़ा था.

सागर. जब किसी का पसंदीदा संगीत बजता है, तो न केवल मन आनंदित होकर ताल से ताल मिलाता है बल्कि हाथ-पैर भी हिलने-डुलने लगते हैं. संगीत सुनने से इंसान की थकान दूर हो जाती है, तनाव कम हो जाता है और मूड फ्रेश हो जाता है लेकिन आपको यह सुनकर शायद आश्चर्य होगा कि बुंदेलखंड के सागर में एक किसान फसलों को साउंड या म्यूजिक थेरेपी देकर न सिर्फ उससे अधिक उत्पादन ले रहा है बल्कि उन फसलों के औषधीय गुणों में भी भारी अंतर देखने को मिल रहा है. किसान का दावा है कि हमारी फसलों को भी अलग-अलग तरह की परेशानियों का सामना अपने जीवनकाल में करना पड़ता है और उन्हें म्यूजिक थेरेपी देने से पौधे हेल्दी रहते हैं, बीमारियां कम आती है, मैच्योरिटी समय से पहले आ जाती है और उत्पादन में 15 फीसदी तक का इजाफा होता है.

सागर से मल्टी लेयर फॉर्म के फार्मूला को ईजाद करने वाले किसान विकास चौरसिया लोकल 18 को बताते हैं कि म्यूजिक थेरेपी एक वैज्ञानिक विधा है, जिसे हम प्रकृति के विज्ञान से जोड़कर देख सकते हैं. हमने बचपन से भंवरों को फसलों में गुनगुनाते हुए देखा है. हम देखते हैं कि जब आम मोर पर आता है, तो तितली, मधुमक्खी, चींटी, भंवरे, ये सब उस पौधे की तरफ आकर्षित होते हैं या ऐसा भी कह सकते हैं कि वह इनका मनोरंजन करते हैं. प्रकृति ने हर एक चीज के लिए मनोरंजन की व्यवस्था की है. हम लोग भी जब स्ट्रेस में होते हैं, तो पसंदीदा गाना सुनते हैं, फिल्म देखते हैं या शांत जगह पर बैठना पसंद करते हैं. ठीक उसी तरह से पौधों में भी तनाव होता है. उनके जीवनकाल में भी कई तरह की परेशानियां होती हैं, जो ध्वनि प्रदूषण के कारण हो सकती हैं, वायु प्रदूषण के कारण हो सकती हैं, जल प्रदूषण के कारण या और भी अन्य किसी कारण से हो सकती हैं. इन सभी समस्याओं का समाधान साउंड थेरेपी के अंदर छिपा हुआ है. हम पौधों को पॉजिटिव वेव देते हैं, तो उनकी ग्रोथ एक अलग लेवल पर जाती है. इससे बीमारियां कम आती हैं. खाद और पानी की जरूरत भी कम पड़ती है. फसल मैच्योरिटी तक बीमार नहीं होती है. आखिरी तक पौधा स्वस्थ होता है. इससे फसल के औषधीय तत्वों में भी अंतर आता है.

साउंड थेरेपी में ज्यादा खर्च नहीं
उन्होंने आगे कहा कि ऐसा करने में बहुत ज्यादा खर्च भी नहीं है. केवल खेत के चारों तरफ आप स्पीकर लगा दीजिए. इसके साथ में जो काम करने वाले लोग होते हैं, उनका भी स्ट्रेस कम होता है. पौधों का भी स्ट्रेस कम होता है और उत्पादन में 10 से 15 परसेंट का अंतर आता है. यह एक्सपेरिमेंट हम कई वर्षों से कर रहे हैं. अलग-अलग फसलों पर अलग-अलग प्रयोग भी करके देखे हैं, तो हमने पाया कि जिस खेत में फसल को म्यूजिक दिया, वह फसल 10 से 15 दिन पहले ही मैच्योरिटी पर आई और उसकी हेल्थ में भी बहुत बड़ा इंपैक्ट पड़ा. हमने काली हल्दी का लैब टेस्ट भी कराया, तो उसका करक्यूमिन लेवल बाकी के जो बिना साउंड वाले खेत थे, उससे दो परसेंट ज्यादा आया. यह अपने आप में चमत्कार है. इस विज्ञान को हम स्वीकार करें और उत्पादन बढ़ाने में ऐसे अपनी परंपरा में शामिल करें. यह थेरेपी पौधों में पॉजिटिव इंपैक्ट डालती है और इनकम को बढ़ाती है.

क्लासिकल म्यूजिक सुनाने पर पौधों में इंप्रूवमेंट
सागर यूनिवर्सिटी के पूर्व वनस्पति शास्त्री डॉ अजय शंकर मिश्रा लोकल 18 को बताते हैं कि क्लासिकल म्यूजिक सुनाने पर पौधों में इंप्रूवमेंट होता है और जो किसान विकास चौरसिया ने किया है, उसमे कहीं कोई गलती नहीं है. यह सिद्धांत पहले से प्रतिपादित है.

Rahul Singh

राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.

राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.

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