देवास‑बदनावर नेशनल हाईवे 69.1 किमी लंबा करीब 1,352 करोड़ रुपए की लागत से आखिरकार पूरा हो चुका है। हाईवे निर्माण भारतमाला योजना के तहत हुआ और 17 फरवरी 2025 को इसे सर्टिफिकेट भी मिल चुका है। इस नई सड़क पर सफर के दौरान कुछ जगह पर लगे साइन बोर्ड और माइल
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उज्जैन से बदनावर की ओर जाने वाले रास्ते पर खरेट गांव से लेकर बड़नगर तक लगे अधिकांश साइन बोर्ड और माइल स्टोन पर शहरों की दूरी गलत है। इनमें एक जगह तो बोर्ड और माइल स्टोन में अलग जानकारी लिखी है, जबकि दोनों पास में ही लगे हुए हैं। नेशनल हाईवे सिंहस्थ 2028 को ध्यान में रखते हुए बनाया है। ऐसे में बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह गलत जानकारी भ्रामक साबित होगी।
आप इसे ऐसे समझें कि खरेट पर लगे माइल स्टोर पर बदनावर की दूरी 42 किमी लिखी है, वहीं लगभग 2 किमी आगे बढ़ने के बावजूद खड़ोतिया गांव के पास लगे माइल स्टोन पर भी बदनावर की दूरी 42 किमी ही है और बड़नगर की दूरी 26 किमी लिखी है, जबकि यहां से बड़नगर की दूरी गूगल मैप अनुसार 45 किमी है।
आगे चिकली पेट्रोल पंप के पास लगे साइन बोर्ड पर बदनावर की दूरी 47 किमी लिखी है, जबकि उसके पास ही लगे माइल स्टोन पर बदनावर की दूरी 38 किमी लिखी है। इसी प्रकार टोल नाका और राजोटा के आसपास 500 मीटर के दायरे में लगे दोनों बोर्डों के बीच 8 किमी की दूरी का अंतर आ रहा है। इसी तरह की कुछ गलतियां आगे भी हैं।
अगर गलती है तो सही करवाएंगे – इंजीनियर नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआई) विभाग अंतर्गत बने इस हाईवे का निर्माण कार्य उदयपुर की जीआर इंफ्रा कंपनी ने किया है। इस प्रोजेक्ट की कंसल्टेंट कंपनी भेापाल की एलएन मालवीय थी। तीन चरण में हुए काम के बाद भी इस तरह की गलती पर जब एनएचएआई से पूछा गया तो विभाग ने ठेका कंपनी इंजीनियर एमएल शर्मा से बात करवाई, जहां शर्मा ने बताया कि वैसे तो गलती नहीं हो सकती है, लेकिन अगर फिर भी कहीं गलती है तो हमें बता दीजिएगा, हम सही करवाएंगे।
भास्कर एक्सपर्ट – कोमल भूतड़ा, पूर्व पीडब्ल्यूडी इंजीनियर
सूचना बोर्ड की जिम्मेदारी कंसल्टेंट कंपनी की, गलती है तो सुधार जरूरी हाईवे के निर्माण के बाद साइन बोर्ड और माइल स्टोन लगाने की जिम्मेदारी ठेका लेने वाली कंपनी की होती है, जाे कि इंडियन रोड कांग्रेस के तय मानकों द्वारा बनाए जाते हैं। बोर्ड का साइज, मोटाई और रंग सब तय होता है और सूचना बोर्ड सही लगे, इसकी जिम्मेदारी कंसल्टेंट कंपनी की होती है और पूरे प्रोजेक्ट का सुपरविजन संबंधित विभाग यानी नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआई) करता है। मैंने यह मार्ग काफी समय से नहीं देखा है लेकिन इस तरह की गलतियां है तो उसे सुधार करने की जरूरत है, ताकि आने वाले यात्री भ्रमित न हो।