देवास का इतिहास
देवास का इतिहास माता टेकरी से जुड़ा हुआ बताया जाता है. जहां पर कई साधकों ने तपस्या कर अपनी साधना को उच्च शिखर पर पहुंचाया है. गुरु गोरखनाथ, राजा विक्रमादित्य के भाई राजा भर्तहरि और सद्गुरु योगेंद्र शीलनाथ महाराज की यह तपोभूमि रही है, जहां पर कई सालों तक इन्हीं साधकों ने माता के चरणों में घोर तपस्या की. यहां पर स्थित माता टेकरी पर हर साल नवरात्रि में 9 दिन का उत्सव मनाया जाता है. इस दौरान नगर में माता के आकर्षक पंडाल लगते हैं और एबी रोड पर जगह-जगह श्रद्धालुओं के लिए भंडारे आयोजित किए जाते हैं. यह क्रम पूरे 9 दिन तक रहता है. माता टेकरी पर वैसे तो 12 महीने श्रद्धालु दर्शन के लिए माई के दरबार पहुंचते हैं, लेकिन नवरात्रि में माता भक्तों का यहां मेला लगता है. दूर दराज से भक्त अपनी मनोकामना लेकर माता के मंदिर पहुंचते हैं और अपनी मनोकामना पूरी करते हैं.
आपको बता दें, नाथ सम्प्रदाय के लोग यहां सुबह-शाम माता की आरती कर पूजन करते हैं, जहां सुबह 6 बजे बडी माता की आरती और 7 बजे छोटी माता की आरती की जाती है. यही क्रम शाम को भी दोहराया जाता है. नाथ समुदाय के लोगों ने यहां पूजन सामग्रियों की दुकानें लगाई हुई हैं, जिनसे उनका घर परिवार चलता है. नवरात्रि के दिनों में खासकर तैयारी और साज सज्जा प्रशासन द्वारा की जाती है और इसके लिए शासकीय प्रबंध समिति भी बनाई गई है. ये समिति इसका विशेष ध्यान रखती हैं. नवरात्रि के पहले और नवरात्रि के बाद में दान पेटियों को खोलकर देखा जाता है और श्रद्धा से जो श्रद्धालु यहां पर चढ़ावा चढ़ाते हैं, उसको मंदिर के कामों में लगाया जाता है.
क्या है माता की पौराणिक कथा?
मान्यताओं के अनुसार, यहां देवी मां के दोनों स्वरूप अपनी जागृत अवस्था में हैं. इन दोनों स्वरूपों को छोटी मां और बड़ी मां के नाम से जाना जाता है. बड़ी मां को तुलजा भवानी और छोटी मां को चामुण्डा देवी का स्वरूप माना गया है. उसके अलावा भी यहां पर 9 देवियों का वास है. यहां के पुजारियों के मुताबिक, बड़ी मां और छोटी मां के मध्य बहन का रिश्ता है. एक बार दोनों में किसी बात को लेकर अनबन हो गई. अनबन होने के कारण दोनों की पीठ हो गई. इससे क्षुब्द होकर दोनों ही माताएं अपना स्थान छोड़कर जाने लगीं. बड़ी मां पाताल में समाने लगीं और छोटी मां अपने स्थान से उठ खड़ी हो गईं और टेकरी छोड़कर जाने लगीं.
माताओं की मूर्तियां स्वयंभू हैं
इस तरह आज भी माताएं अपने इन्हीं स्वरूपों में विराजमान हैं और यहां के लोगों के अनुसार, माताओं की ये मूर्तियां स्वयंभू हैं और जागृत स्वरूप में हैं. सच्चे मन से यहां जो भी मन्नत मांगी जाती है, वो हमेशा पूरी होती है. हर नवरात्रि में अष्ठमी और नवमी को यहां पर हवन यज्ञ का आयोजन होता है, जिसमें दोनों राजवंश के लोग मौजूद होते हैं. नवरात्रि में रात दिन भक्तों का यहां तांता लगता है. माता की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है. माता के विषय में यह पारंपरिक लोककथा है कि यहां माता दिन में तीन रूप बदलती है. सुबह को बाल अवस्था, दोहपर को युवावस्था और रात होते होते मां को वृद्धावस्था रूप देखा जा सकता है.
मान्यताओं के अनुसार, संतान न होने पर माता को 5 दिन तक पान का बीड़ा खिलाया जाता है. इसके साथ ही उल्टा साथिया बनाने की यहां पर प्रथाएं हैं. उसके बाद मान्यता पूरी होने पर साथिया सही भी यहां पर किया जाता है. बहुत से लोग यहां घुटनों के बल और दंडवत अपनी मनोकामना पूरी करने आते हैं. शहर के बीचो-बीच स्थित माता टेकरी पहाड़ों पर विराजी हैं, जिनके यहां विराट स्वरूप में दर्शन भक्तों को होते हैं.