दीपावली पर्व खत्म होते ही कटनी जिले के गांवों और शहरों में एक सुंदर परंपरा का नजारा देखने को मिला। जिले भर में ग्वालबालों के समूह ने अपनी पुरानी ‘दिवाली नृत्य’ और ‘दिवाली गायन’ की परंपरा को मनाया। यह आयोजन लोगों की धार्मिक आस्था, एकता और पुरानी धरोहर
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बड़वारा तहसील के गांवों जैसे बड़वारा, विलायत कला, मझगवां, विलायत खुर्द में हर साल की तरह इस साल भी ‘दिवाली नृत्य’ का आयोजन हुआ। ग्वालबालों ने अपनी पारंपरिक कला का शानदार प्रदर्शन किया।
बरही नगर में दिवाली के अगले दिन, यानी मंगलवार को भी ‘दिवाली नृत्य’ का कार्यक्रम रखा गया। ग्वालबालों ने सबसे पहले विजयनाथ धाम शिव मंदिर में अपने देवता बाघेश्वर बाबा और गौरैया की पूजा और हवन किया।
इसके बाद, उन्होंने आकर्षक दिवाली नृत्य प्रस्तुत किया, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग जमा हुए और पूरे इलाके में खुशी का माहौल छा गया।
पारंपरिक गीतों पर युवा जमकर झूमे।
गोमाता की रक्षा और शुभता के लिए है यह परंपरा
स्थानीय बुजुर्गों ने बताया कि ‘दिवाली नृत्य’ और गायन की यह परंपरा कई सालों से चली आ रही है और इसे धर्म का काम माना जाता है। यह खास तौर पर गोमाता की रक्षा और लोगों की सुरक्षा के लिए किया जाता है।
नृत्य से पहले ग्वालबाल गोमाता की विशेष पूजा करते हैं, उनके अच्छे स्वास्थ्य और लोगों की लंबी उम्र के लिए प्रार्थना करते हैं। यह आयोजन समृद्धि और आपसी तालमेल का प्रतीक है।

रीठी के बरेहटा गांव में युवा संभाल रहे विरासत
रीठी तहसील के बरेहटा गांव में भी दिवाली के अगले दिन लोक-संस्कृति का सुंदर मेल देखने को मिला। मृदंग (एक तरह का ढोल) और नगाड़े की आवाज़ पर पूरा गांव झूम उठा। ग्वालबालों ने पारंपरिक कपड़े पहनकर पूरे गांव में घूमते हुए नृत्य किया और मीठे लोक गीतों से वातावरण को भक्तिमय बना दिया।

ग्रामीणों ने ग्वालबालों का फूलों से स्वागत किया। गांव के बुजुर्गों का कहना है कि युवा पीढ़ी इस अनोखी परंपरा को बड़े उत्साह से आगे बढ़ा रही है, ताकि यह धरोहर आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रहे।