भारतीय महिला क्रिकेट टीम को वनडे वर्ल्ड कप जीते 5 दिन बीत चुके हैं, लेकिन अभी भी जश्न और इनामों की घोषणाएं जारी हैं. हो भी क्यों न, भारत ने पहली बार जो महिला वर्ल्ड कप अपने नाम किया है. 2 नवंबर को हरमनप्रीत कौर की अगुवाई वाली टीम ने जब आधी रात को फाइनल में साउथ अफ्रीका को रौंदा तो पूरा देश खुशी से झूम उठा. यह वो पल था, जिसे जीने का सपना हर कोई क्रिकेटर देखता है, लेकिन पूरा बहुत कम ही कर पाते हैं. भारत ने ट्रॉफी तो उठाई ही, साथ ही खिलाड़ियों पर पैसों की बरसात भी हुई. आज भारतीय महिला क्रिकेट टीम मालामाल है, लेकिन एक समय ऐसा था, जब टीम के पास फ्लाइट टिकट करने तक के पैसे नहीं थे. उस समय में एक महिला सामने आई, जिसने चुपचाप भारतीय महिला क्रिकेट को चमकाने के लिए कुर्बानियां दीं. भारतीय महिला क्रिकेट के चमकने के पीछे एक ऐसी कहानी छिपी है जिसे बहुत कम लोग जानते हैं. आइए हम आपको विस्तार से बताते हैं…
टीम इंडिया की ‘सायलेंट स्पॉन्सर’
दरअसल, हम जिस महिला की बात कर रहे हैं वो नाम और कोई नहीं बल्कि अभिनेत्री और टीवी होस्ट मंदिरा बेदी हैं. मंदिरा बेदी ने न सिर्फ टीवी और फिल्मों में, बल्कि क्रिकेट की दुनिया में भी एक नई पहचान बनाई. मंदिरा ने उस दौर में भारतीय महिला क्रिकेट को जिंदा रखने में मदद की, जब टीम आर्थिक तंगी से बुरी तरह जूझ रही थी. उन्होंने कुछ भी सोचे बिना महिला क्रिकेट को बढ़ावा देने के लिए अपनी कमाई टीम को दान की.
बुरे दौर से गुजर रही थी महिला टीम
यह 2006 से पहले की दौर की बात है जब भारतीय महिला क्रिकेट टीम बीसीसीआई (BCCI) के अंतर्गत नहीं आती थी. उस समय टीम का संचालन विमेन्स क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ इंडिया (WCAI) करती थी. लेकिन इस संस्था के पास पैसों की भारी कमी थी. अंजुम चोपड़ा, मिताली राज और झूलन गोस्वामी जैसे खिलाड़ी सिर्फ खेल के प्रति अपने प्यार की वजह से खेलती थीं. उन्हें सैलरी नहीं मिलती थी, न सही ट्रैवल की सुविधा और न ही रहने की. 2003 में हालात इतने खराब हो गए कि टीम इंग्लैंड दौरे पर जाने के लिए हवाई टिकट तक नहीं खरीद पा रही थी. स्पॉन्सर नहीं थे. ऐसा लग रहा था कि दौरा रद्द हो जाएगा. तभी आगे आईं मंदिरा बेदी.
मंदिरा ने की थी फंडिंग
मंदिरा उस समय ज्वेलरी के लिए एक विज्ञापन शूट कर रही थीं. जब उन्हें महिला क्रिकेट टीम की परेशानी के बारे में पता चला, तो उन्होंने बिना कुछ सोचे-समझे अपने पूरे विज्ञापन का मेहनताना WCAI को दान कर दिया, ताकि टीम इंग्लैंड जा सके. WCAI की सेक्रेटरी और सुनील गावस्कर की बहन नूतन गावस्कर ने बाद में बताया था, ‘मंदिरा ने जो फीस दी, उसी पैसे से हम खिलाड़ियों के हवाई टिकट का इंतजाम कर पाए. अगर वो मदद न करतीं तो शायद टीम इंग्लैंड नहीं जा पाती.’
लगा दिया एड़ी-चोटी का जोर
मंदिरा बेदी ने भारतीय महिला क्रिकेट को जिंदा रखने के लिए एड़ी से चोटी तक का जोर लगा दिया था. यह सिर्फ एक बार की मदद नहीं थी. 2003 से 2005 के बीच मंदिरा ने अपने फिल्म और टीवी इंडस्ट्री के संपर्कों से फंड जुटाए, ब्रांड्स को मनाया कि वे महिला क्रिकेट को स्पॉन्सर करें और खिलाड़ियों को खेलने का मौका मिलता रहे. उन्होंने 2004 में वेस्टइंडीज के खिलाफ सीरीज के लिए अस्मी ज्वेलरी को स्पॉन्सर भी बनवाया. उस समय महिला क्रिकेट पर किसी का ध्यान नहीं था. मंदिरा की मौजूदगी ने लोगों का ध्यान इस खेल की ओर खींचा. वो खुद पहली महिला क्रिकेट एंकरों में से एक बनीं और उन्होंने क्रिकेट के मंच पर महिलाओं के लिए जगह बनाई.
नूतन गावस्कर बाद में बताया था, ‘मंदिरा ने कभी अपने योगदान के बारे में बात नहीं की. उन्होंने यह सब सिर्फ इसलिए किया क्योंकि वो चाहती थीं कि लड़कियां खेलें. मंदिरा जानती थीं कि एक पुरुष-प्रधान दुनिया में महिलाओं के लिए अपनी पहचान बनाना कितना कठिन है. उनकी यही समझदारी और संवेदनशीलता ने महिला क्रिकेट को उस समय जिंदा रखा, जब हालात सबसे बुरे थे.’
और फिर आया वो पल…
2006 में जब बीसीसीआई ने महिला क्रिकेट को अपने अधीन ले लिया, तब हालात धीरे-धीरे सुधरने लगे और आखिरकार 2025 में हरमनप्रीत कौर की कप्तानी में भारत ने वर्ल्ड कप जीता. जाहिर है मंदिरा को इस जीत से एक अजीब सा सुकून दिया होगा. मंदिरा ने इंस्टाग्राम पर बस एक लाइन लिखी, ‘You didn’t play for a nation – you moved it.’ मंदिरा की ये छोटी से लाइन बहुत कुछ बयां करती है.