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पशु चिकित्सक डॉ. बृहस्पति भारती ने बताया कि यह रोग मौसम बदलने पर सबसे ज्यादा सक्रिय होता है. हाल की बारिश और बढ़ती हुई गर्मी की वजह से ह्यूमिडिटी बढ़ी है जो बीमारी फैलने का बड़ा कारण बन सकती है. FMD में सबसे पहले मुँह जैसे जीभ, दाँतों के पास और अंदरूनी हिस्सों में छाले बनते हैं. वहीं पैरों में खुरों के बीच और किनारों पर फफोले पड़ जाते हैं.
सर्दियों में पशुओं में अगर आपको ये गिने चुनें लक्षण दिखाई दे समझ लेना की मामला सीरियस है क्युकी इस बीच खुरपका-मुंहपका (FMD) रोग तेजी से फैलने का खतरा बढ़ गया है. यह संक्रामक वायरल बीमारी गाय, भैंस, बकरी और सूअर जैसे दो-खुर वाले जानवरों को प्रभावित करती है. संक्रमित पशुओं के मुँह और खुरों के पास फफोले बनने लगते हैं.जिससे वे चारा नहीं खा पाते और दूध उत्पादन में लगभग 80% तक कमी देखी जाती है. पशु चिकित्सकों ने इस दौरान साफ सफाई, समय पर टीकाकरण और बीमार पशुओं को अलग रखने की सख्त सलाह दी है.
मौसम बदलते ही बढ़ता है संक्रमण
पशु चिकित्सक डॉ. बृहस्पति भारती ने बताया कि यह रोग मौसम बदलने पर सबसे ज्यादा सक्रिय होता है. हाल की बारिश और बढ़ती हुई गर्मी की वजह से ह्यूमिडिटी बढ़ी है जो बीमारी फैलने का बड़ा कारण बन सकती है. FMD में सबसे पहले मुँह जैसे जीभ, दाँतों के पास और अंदरूनी हिस्सों में छाले बनते हैं. वहीं पैरों में खुरों के बीच और किनारों पर फफोले पड़ जाते हैं. कई बार हालत इतनी खराब हो जाती है कि पूरा खुर तक निकल जाता है जिसे वापस ठीक होने में 9–10 महीने लग जाते हैं.
एक से पूरी डेयरी में फैल सकता संक्रमण
डॉ. भारती के अनुसार बीमारी की मृत्यु दर भले कम हो लेकिन इसका संक्रमण बेहद तेज़ी से फैलता है. उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि अगर किसी डेयरी में 40 जानवर हैं तो यह रोग एक संक्रमित पशु से शुरू होकर सभी 40 मवेशियों तक फैल सकता है. FMD के पाँच प्रमुख लक्षण हैं बहुत तेज़ बुखार, लंगड़ाकर चलना, लगातार लार गिरना, मुँह और खुरों में छाले और दूध उत्पादन में 80–90% तक गिरावट.
सरकार का मुफ्त टीकाकरण कार्यक्रम
डॉ. साहब ने बताया कि सरकार द्वारा नेशनल एनिमल डिज़ीज़ कंट्रोल प्रोग्राम के तहत हर छह महीने में एफएमडी का निशुल्क वैक्सीनेशन कैंप लगाया जाता है. पशुपालकों को समय पर टीकाकरण करवाने की विशेष सलाह दी गई है ताकि संक्रमण को शुरुआत में ही रोका जा सके.
देसी उपचार कारगर, डॉक्टर भी मानते हैं असरदार
एफएमडी में देसी उपचार भी काफी प्रभावी माने जाते हैं. तेज बुखार होने पर 4–5 दिन तक बुखार की गोलियाँ दी जा सकती हैं. यदि पैरों में छाले पड़ चुके हों तो पशु को कच्ची मिट्टी या हल्के कीचड़ पर चलाना चाहिए ताकि खुरों पर दबाव न पड़े और फफोले फूटने से बचें. मुँह के छालों में दिन में दो बार ग्लिसरीन या मीठा तेल (सरसों, अलसी) लगाना लाभकारी है. भोजन में सूखे भूसे की जगह नरम आहार जैसे दलिया, चोकर, गीला भूसा आदि देना चाहिए.
नीम और हल्दी से घावों की सफाई
खुरों और मुँह के छालों की देखभाल में नीम के पत्तों का गर्म पानी बेहद कारगर है. दिन में दो तीन बार इससे घावों को साफ कर लें और फिर हल्दी मिला तेल लगाएँ. इससे घाव जल्दी भरते हैं और संक्रमण नियंत्रित रहता है.