रीवा का रॉयल खजाना! सदियों पुरानी जोहरी दुकान आज भी खास, जहां आज भी बनते हैं शाही गहने

रीवा का रॉयल खजाना! सदियों पुरानी जोहरी दुकान आज भी खास, जहां आज भी बनते हैं शाही गहने


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Rewa Jewellery History: विंध्य की धरती अपनी वीरता और समृद्ध संस्कृति के साथ-साथ पारंपरिक आभूषणों के लिए भी प्रसिद्ध है. इनमें से महत्वपूर्ण आभूषणों के डिजाइन की मांग लोगों द्वारा आज भी की जाती है. ये आभूषण बघेलवंश शाही पहचान का प्रतीक माने जाते हैं. यह पारंपरिक गहने खासतौर पर दुल्हनों द्वारा विवाह के अवसर पर पहने जाते है और इनमे से कुछ का आकार चौकोर या आयताकार होता है. 

Rewa Jewellery History: विंध्य की धरती अपनी वीरता और समृद्ध संस्कृति के साथ-साथ पारंपरिक आभूषणों के लिए भी प्रसिद्ध है. इनमें से महत्वपूर्ण आभूषणों के डिजाइन की मांग लोगों द्वारा आज भी की जाती है. ये आभूषण बघेलवंश शाही पहचान का प्रतीक माने जाते हैं. यह पारंपरिक गहने खासतौर पर दुल्हनों द्वारा विवाह के अवसर पर पहने जाते हैं और इनमें से कुछ का आकार चौकोर या आयताकार होता है. विंध्य की धरती अपनी खास पाक कला और संस्कृति के लिए जानी जाती है, उतनी ही यह पारंपरिक आभूषणों के लिए प्रसिद्ध है. यहां की हर वस्तु में शाही परंपराओं और शौर्य की झलक मिलती है. इन्हीं पारंपरिक गहनों में से एक है आड़, यह एक पारंपरिक आभूषण है. आड़ गहने को विंध्य शाही रानिया खासकर जो राजस्थान से ब्याह कर रीवा रियासत आई थी उनके द्वारा पहना जाता था. इसकी बनावट अन्य सामान्य गहनों से अलग होती है. इस पारंपरिक गहने का उपयोग राजा महाराजाओं के समय से होता आ रहा है, यह देखने में गले के हार के समान होता है.

सुखदेव सराफ की सैकड़ों वर्ष पुरानी दुकान
रीवा की सराफा बाजार में आज भी वो दुकानें मौजूद हैं जो कभी रीवा की रानियों के गहने गढने का काम करते थे. ऐसी ही प्रसिद्ध एक दुकान है सुखदेव सराफ की ये दुकान सैकड़ों वर्ष पुरानी है. अब इस दुकान का संचालन लखनलाल करते हैं. और उन्होंने Local18 को बताया कि आप पूरे विंध्य क्षेत्र में किसी से भी पूछ सकते हैं कि विंध्य क्षेत्र की सबसे पुरानी सुनार की दुकान कौन सी है तो सुखदेव सराफ का ही नाम आयेगा. उन्होंने बताया कि सैकड़ वर्ष से ज्यादा का समय हो गया है, इस दुकान में मेरे बाबा मेरे पिता सभी लोग शाही जोहरी थे. धीरे-धीरे परिवार बढ़ा तो इसी नाम से कई दुकानें हो गई हैं. हमारे पूर्वजों को राजस्थान से महाराजा गुलाब सिंह जूदेव द्वारा लाया गया था, और मेरे परदादा, दादा सब लोग महारानियों के आभूषण बनाना साफ करना यही सब काम किया करते थे. अब परिवेश बदल गया है, कुछ आभूषण तो यहां से महल जाते हैं पर कमतर हैं. पहले जो आभूषण रानिया पहना करती थी वो राजस्थानी संस्कृति से प्रभावित हुआ करते थे.

आड पारंपरिक आभूषण
एक आड नाम का आभूषण होता है जो राजस्थान में प्रचलित है खासतौर पर आड़ को शादियों, तीज-त्योहारों और सांस्कृतिक आयोजनों में पहना जाता है, जब कोई दुल्हन अपने विवाह के दिन यह आड़ पहनती है, तो उसका श्रृंगार पूरा और पारंपरिक माना जाता है. यह गहना न केवल उसकी सुंदरता में चार चांद लगाता है, बल्कि यह उसकी पारिवारिक और सांस्कृतिक जड़ों को भी दर्शाता है. आड़ बनाना आसान काम नहीं है, इसे तैयार करने में कुशल सुनारों की महीनों की मेहनत लगती है. यही कारण है कि इसकी कीमत भी अन्य गहनों की तुलना में अधिक होती है. इसके निर्माण में सोना, चांदी और कभी-कभी रत्नों का प्रयोग किया जाता है.

आज के फैशन के दौर में भी शाही आभूषण के डिजाइन अपनी पहचान बनाए हुए है, कई आधुनिक डिजाइनर इन्हें अपने नए रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं, ताकि यह गहने परंपरा के साथ-साथ आधुनिकता का भी प्रतीक बन सके. अब इन्हें हल्के वजन और स्टाइलिश डिजाइनों में भी तैयार किया जा रहा है, जिससे यह युवा पीढ़ी के बीच भी लोकप्रिय हो गया है. आज यह गहने विंध्य क्षेत्र के पारंपरिक वेशभूषा के साथ फैशन शो पर भी अपनी बढ़त बढ़ा रहा है, ये शाही आभूषण न केवल एक आभूषण है बल्कि विंध्य की रानियों के शाही अंदाज का नायाब उदाहरण है.

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Deepti Sharma

Deepti Sharma, currently working with News18MPCG (Digital), has been creating, curating and publishing impactful stories in Digital Journalism for more than 6 years. Before Joining News18 she has worked with Re…और पढ़ें

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राजघराने की पहचान बनी ये दुकान, जहां बनते थे महारानियों के गहने



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