अहिल्याबाई की मूर्ति तोड़ी, काशी से इंदौर तक उबाल: होलकर ट्रस्ट ने मोदी-योगी को लिखा- दोबारा प्रतिष्ठित कराएं, डीएम बोले- हम तो ठीक करा रहे – Madhya Pradesh News

अहिल्याबाई की मूर्ति तोड़ी, काशी से इंदौर तक उबाल:  होलकर ट्रस्ट ने मोदी-योगी को लिखा- दोबारा प्रतिष्ठित कराएं, डीएम बोले- हम तो ठीक करा रहे – Madhya Pradesh News




इंदौर। उत्तरप्रदेश के वाराणसी में विश्वविख्यात मणिकर्णिका घाट के एक हिस्से को हाल ही में विकास कार्यों के नाम पर तोड़े जाने का मामला अब देशव्यापी विवाद का रूप ले चुका है। यह वही ऐतिहासिक घाट है, जिसका निर्माण वर्ष 1771 में मालवा की शासिका देवी अहिल्याबाई होलकर ने कराया था। करीब ढाई सौ साल पुरानी इस विरासत को श्मशान घाट विकास परियोजना के तहत क्षतिग्रस्त किए जाने के आरोपों के बाद यूपी के काशी से लेकर एमपी के इंदौर तक लोगों की भावनाओं में उबाल है। एमपी में इंदौर ही नहीं बल्कि पूरे मालवा अंचल में नाराजगी और आक्रोश है। मामला इसलिए भी संवेदनशील हो गया है, क्योंकि अहिल्याबाई होलकर न सिर्फ मालवा या महेश्वर की महारानी थीं, बल्कि उन्हें पूरे भारत में सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक माना जाता है। ऐसे में उनकी बनाई ऐतिहासिक संरचना को नुकसान पहुंचना सिर्फ एक निर्माण विवाद नहीं, बल्कि विरासत और आस्था से जुड़ा गंभीर मुद्दा बन गया है। सिलसिलेवार समझिए इस पूरे मामले को… प्रोजेक्ट: 18 करोड़ का, लेकिन सवाल विरासत पर प्रशासनिक रिकॉर्ड के मुताबिक मणिकर्णिका घाट क्षेत्र में करीब 18 करोड़ रुपए की लागत से श्मशान घाट विकास परियोजना प्रस्तावित है। इस परियोजना का भूमिपूजन वर्ष 2023 में स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था। वाराणसी लोकसभा क्षेत्र से सांसद होने के नाते प्रधानमंत्री का इस इलाके से सीधा जुड़ाव है। प्रशासन का दावा है कि परियोजना के तहत लगभग 29,350 वर्ग मीटर क्षेत्र में निर्माण कार्य किया जा रहा है। गंगा तट की दलदली जमीन को देखते हुए 15 से 20 मीटर गहराई तक पाइलिंग कर सख्त मिट्टी तक फाउंडेशन तैयार किया गया, ताकि बाढ़ के दौरान किसी तरह का संरचनात्मक नुकसान न हो। विरासत पर आंच से से शुरू हुआ विवाद घाट पर चल रहे प्रोजेक्ट में वह हिस्सा भी क्षतिग्रस्त हो गया, जिसे अहिल्याबाई होलकर की विरासत माना जाता है। प्रत्यक्षदर्शियों और स्थानीय लोगों के अनुसार, निर्माण के दौरान घाट की पुरानी सीढ़ियां तोड़ दी गईं। इतना ही नहीं, देवी अहिल्याबाई से जुड़ी कई ऐतिहासिक मूर्तियां और धार्मिक प्रतीक भी क्षतिग्रस्त हो गए। कुछ मूर्तियां टूटकर मलबे में दब गईं, तो कुछ खुले में पड़ी मिलीं। एक शिवलिंग के क्षतिग्रस्त होने की बात भी सामने आई है। जिस हिस्से को तोड़ा गया, वहां देवी अहिल्याबाई की शिव आराधना से जुड़ी प्रतिमाएं स्थापित थीं। आरोप है कि न तो इन्हें संरक्षित किया गया और न ही किसी ऐतिहासिक संस्था या ट्रस्ट से पूर्व अनुमति ली गई। खासगी ट्रस्ट का आरोप: बिना सूचना, कुछ घंटों में ध्वस्तीकरण मणिकर्णिका घाट की देखरेख खासगी देवी अहिल्याबाई होलकर चैरिटीज ट्रस्ट करता है। ट्रस्ट के अध्यक्ष यशवंतराव होलकर ने इस कार्रवाई पर कड़ा ऐतराज जताया है। यशवंतराव होलकर ने जारी पत्र में कहा कि हमें अत्यंत दुख और निराशा के साथ सूचित करना पड़ रहा है कि विकास के नाम पर वाराणसी के ऐतिहासिक मणिकर्णिका घाट को अचानक ध्वस्त कर दिया गया। सन् 1791 में पुण्यश्लोक देवी अहिल्याबाई होलकर ने इसका जीर्णोद्धार कराया था। यह स्थान अहिल्याबाई मां साहेब के लिए अत्यंत महत्व रखता था। उन्होंने आरोप लगाया कि 10 जनवरी 2026 को बिना किसी पूर्व सूचना के, वाराणसी नगर निगम अधिकारियों के निर्देश पर कुछ ही घंटों में घाट का यह हिस्सा तोड़ दिया गया। यह पूरी कार्रवाई उस स्थान के इतिहास और सांस्कृतिक महत्व की पूरी तरह अनदेखी करते हुए की गई। ‘जिस देवी की प्रतिमा काशी में स्थापित की, उसी की मलबे में’ यशवंतराव होलकर ने पत्र में यह भी कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर में देवी अहिल्याबाई होलकर की प्रतिमा स्थापित कर उन्हें भारत की संस्कृति की महान रक्षक के रूप में सम्मान दिया है। “लेकिन विडंबना देखिए कि उसी देवी अहिल्याबाई की पवित्र और ऐतिहासिक मूर्तियां आज मणिकर्णिका घाट के मलबे में दबी पड़ी हैं।” ट्रस्ट ने स्पष्ट किया है कि वह इन मूर्तियों को पुनः प्रतिष्ठित करने के लिए तत्काल कार्रवाई कर रहा है और जिम्मेदार संस्थाओं के खिलाफ कानूनी कदम भी उठाए जाएंगे। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री से की ये मांगें होलकर ट्रस्ट और इंदौर के होलकर राजपरिवार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से निम्न मांगें की हैं। – पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए। – दोषी अधिकारियों और एजेंसियों पर सख्त कार्रवाई हो। – मलबे से क्षतिग्रस्त मूर्तियों को निकालकर ट्रस्ट को सौंपा जाए। – ट्रस्ट के साथ समन्वय कर मूर्तियों को दोबारा स्थापित कराया जाए। कई सामाजिक संगठनों ने कहा- ये व्यवहार स्वीकार नहीं घटना के बाद इंदौर में सामाजिक संगठनों का आक्रोश फूट पड़ा है। धनगर समाज, पाल समाज और बघेल समाज सहित कई संगठनों ने 15 जनवरी को बैठक बुलाकर आगे की रणनीति तय करने का ऐलान किया है। संगठनों का कहना है कि जिस समय देशभर में अहिल्याबाई होलकर के 300वें जन्म वर्ष का समापन हुआ है, उसी समय उनकी विरासत के साथ ऐसा व्यवहार अस्वीकार्य है। इतिहासकार बोले- मालवा नहीं पूरे देश की धरोहर पर प्रहार वरिष्ठ इतिहासकार जफर अंसारी ने इस घटना को बेहद दुखद बताया। उन्होंने कहा कि “देवी अहिल्याबाई सिर्फ मालवा या महेश्वर की नहीं, बल्कि पूरे भारतवर्ष की धरोहर हैं। उनके हर कार्य में दूरदर्शिता और लोककल्याण झलकता है।” उन्होंने याद दिलाया कि 31 मई 2025 को पूरे देश में अहिल्याबाई होलकर की 300वीं जयंती मनाई गई थी। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मध्यप्रदेश आए थे, भोपाल में विकास परियोजनाओं का उद्घाटन किया गया, डाक टिकट और 300 रुपए का चांदी का स्मारक सिक्का जारी किया गया। खासगी संपत्ति से हुआ था जीर्णोद्धार इतिहासकार अंसारी ने बताया कि अहिल्याबाई होलकर ने जिन मंदिरों और घाटों का निर्माण व जीर्णोद्धार कराया, वह उनकी खासगी संपत्ति से किया गया था, न कि राजकीय कोष से। होलकर रियासत में ‘खासगी’ एक अलग व्यवस्था थी, जो रानी की निजी संपत्ति मानी जाती थी। इसी से देशभर में सैकड़ों मंदिरों का निर्माण और संरक्षण हुआ। कानून भी सवालों के घेरे में विशेषज्ञों का कहना है कि मणिकर्णिका घाट जैसे स्थल पर निर्माण से पहले प्राचीन स्मारक एवं पुरातत्व स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 के तहत विशेष सावधानी जरूरी थी। ऐतिहासिक स्थलों के आसपास निर्माण पर सख्त नियम हैं। ऐसे में यह मामला अब सिर्फ धार्मिक या भावनात्मक नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और कानूनी उल्लंघन का भी बन गया है।
अब जानिए मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट के बारे में काशी के 84 घाटों में विशेष स्थान रखता है मणिकर्णिका मणिकर्णिका घाट काशी के 84 प्रमुख घाटों में से एक है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यहीं माता पार्वती की कणिका गिरी थी, जिससे घाट का नाम पड़ा। मान्यता है कि यहां अंतिम संस्कार होने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। देवी अहिल्याबाई होलकर ने इस घाट पर यात्रियों के लिए धर्मशालाएं, मंदिर, अन्नक्षेत्र और स्नान सुविधाएं विकसित कराईं। इसका धार्मिक संबंध काशी विश्वनाथ धाम से भी जुड़ा हुआ है।



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