मध्य प्रदेश की सियासत में दिग्विजय सिंह को यूं ही ‘चाणक्य’ या राजनीतिक बिसात का माहिर खिलाड़ी नहीं कहा जाता. जब सबको लगता है कि वे हासिये पर जा रहे हैं, तभी वे एक ऐसी चाल चलते हैं जो न केवल विरोधियों को, बल्कि अपनी ही पार्टी के भीतर के प्रतिद्वंद्वियों को चारों खाने चित कर देती है. 12 जनवरी को दिग्विजय सिंह ने ऐलान किया कि वे राज्यसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे और उनकी सीट किसी दलित या आदिवासी (SC/ST) को मिलनी चाहिए. यह ऊपरी तौर पर ‘त्याग’ लग सकता है, लेकिन सियासी चश्मे से देखें तो यह ऐसा दांव है जिसमें कमलनाथ के साथ-साथ पार्टी के सवर्ण नेताओं के अरमानों पर पानी फेर दिया है. दिग्विजय सिंह के इस एक बयान ने मध्य प्रदेश कांग्रेस में सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर ऐसा बवंडर खड़ा कर दिया है, जिसने अगले साल अप्रैल में खाली होने वाली राज्यसभा सीट के समीकरण को पूरी तरह बदल दिया है.
किस तरह का संकट
- यदि क्षत्रिय दिग्विजय सिंह अपनी सीट दलितों के लिए छोड़ रहे हैं, तो सवर्ण कमलनाथ उस सीट पर दावा कैसे ठोकेंगे? अगर वे ऐसा करते हैं, तो उन पर दलित विरोधी होने का ठप्पा लगने का खतरा होगा.
- कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व राहुल गांधी के ‘जाति जनगणना’ और ‘दलित प्रेम’ के एजेंडे पर चल रहा है. ऐसे में दिग्विजय सिंह ने दलित कार्ड खेलकर हाईकमान के लिए भी कमलनाथ को टिकट देना मुश्किल कर दिया है.
सवर्ण नेताओं का ‘खेल’ बिगड़ा
दिग्विजय सिंह ने जैसे ही यह कहा कि मेरी सीट पर कोई दलित या आदिवासी जाना चाहिए, वैसे ही उनके समर्थक और प्रदेश अनुसूचित जाति मोर्चा के अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने चिठ्ठी लिखकर मोर्चा खोल दिया. यह एक सोची-समझी रणनीति थी. अब समीकरण यह बन गया है. यदि कांग्रेस किसी ब्राह्मण, ठाकुर, बनिया को भेजती है, तो भाजपा कहेगी कि कांग्रेस ने दलित की सीट छीन ली. यदि किसी ओबीसी जैसे अरुण यादव या जीतू पटवारी को भेजती है, तो एससी-एसटी वर्ग नाराज होगा, जिसकी वकालत खुद पार्टी का सबसे वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह कर रहे हैं. कुल मिलाकर, दिग्विजय ने सवर्ण नेताओं के सामने एक ‘लक्ष्मण रेखा’ खींच दी है, जिसे पार करना अब राजनीतिक आत्महत्या जैसा होगा.
24 साल पुराना दलित एजेंडा
राजनीति में संयोग कुछ नहीं होता. दिग्विजय सिंह का यह कदम हमें 24 साल पीछे ले जाता है. साल 2002 में जब दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री थे, उन्होंने ‘भोपाल घोषणा पत्र’ के जरिए एक व्यापक दलित एजेंडा लागू किया था. तब उन्होंने दलितों को ठेके देने, जमीनों के पट्टे देने और पुजारियों के रूप में नियुक्त करने जैसे क्रांतिकारी कदम उठाए थे. हालांकि, 2003 के चुनाव में उन्हें बुरी तरह हार मिली और उमा भारती की आंधी में यह एजेंडा उड़ गया.
अब 2024-25 में, जब कांग्रेस रसातल में है, दिग्विजय सिंह उसी ‘दलित एजेंडे’ को पुनर्जीवित कर रहे हैं. इसके दो मायने हैं. वे जानते हैं कि अब वे चुनाव लड़ने की स्थिति में नहीं हैं. ऐसे में ‘किंगमेकर’ और ‘दलितों के मसीहा’ बनकर वे पार्टी में अपनी धमक बनाए रख सकते हैं. दलित सीएम की मांग करके उन्होंने परोक्ष रूप से जीतू पटवारी और उमंग सिंघार दोनों के सामने चुनौती पेश की है. उन्होंने यह संदेश दिया है कि असली नब्ज अभी भी उन्हीं के हाथ में है.