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Khandwa 5 Famous Personalities: खंडवा भले ही नक्शे पर एक छोटा सा शहर हो, लेकिन इस शहर की मिट्टी में कुछ खास है. यही वजह है कि यहां से ऐसी-ऐसी हस्तियां निकलीं, जिन्होंने देश ही नहीं बल्कि दुनिया में खंडवा का नाम रोशन किया. कोई भक्ति और आस्था का प्रतीक बना, तो कोई सुरों का सम्राट, कोई स्वतंत्रता संग्राम का सिपाही तो कोई साहित्य और पत्रकारिता की पहचान. आज हम आपको बता रहे हैं खंडवा की 5 फेमस हस्तियों के बारे में…
खंडवा भले ही नक्शे पर एक छोटा सा शहर हो, लेकिन इस शहर की मिट्टी में कुछ खास है. यही वजह है कि यहां से ऐसी-ऐसी हस्तियां निकलीं, जिन्होंने देश ही नहीं बल्कि दुनिया में खंडवा का नाम रोशन किया. कोई भक्ति और आस्था का प्रतीक बना, तो कोई सुरों का सम्राट, कोई स्वतंत्रता संग्राम का सिपाही तो कोई साहित्य और पत्रकारिता की पहचान आज हम आपको बता रहे हैं खंडवा की 5 ऐसी फेमस हस्तियों की कहानी, जिनके नाम आज भी पूरे देश में सम्मान के साथ लिए जाते हैं.

धूनीवाले दादाजी खंडवा की पहचान खंडवा की पहचान अगर किसी नाम से सबसे पहले होती है, तो वह है धूनीवाले दादाजी.<br />खंडवा स्थित उनका दरबार आज भी देश के सबसे जागृत सिद्ध तीर्थ स्थलों में गिना जाता है.<br />दादाजी का असली नाम स्वामी केशवानंदजी महाराज था.भक्त उन्हें भगवान शिव का अवतार मानते हैं.उन्होंने वर्ष 1930 में खंडवा में समाधि ली थी. तब से लेकर आज तक उनके दरबार में धूनी निरंतर जल रही है, जिसे चमत्कारी माना जाता है.<br />मान्यता है कि सच्चे मन से मांगी गई हर मन्नत यहां जरूर पूरी होती है. गुरु पूर्णिमा पर यहां लाखों श्रद्धालु देश-विदेश से दर्शन के लिए पहुंचते हैं. आज भी खंडवा को लोग “दादाजी का शहर” कहकर पहचानते हैं.

किशोर कुमार सुरों का जादूगर<br />अगर खंडवा का नाम पूरे देश में सबसे ज्यादा मशहूर हुआ है, तो वह महान गायक किशोर कुमार की वजह से 4 अगस्त 1929 को खंडवा में जन्मे किशोर दा का असली नाम आभास कुमार गांगुली था. उनका बचपन खंडवा के गांगुली हाउस में बीता. वे हमेशा कहते थे “मुझे जो कुछ मिला, वो खंडवा की मिट्टी से मिला.अपने हर शो की शुरुआत वे गर्व से कहते थे “मैं किशोर कुमार खंडवे वाला”उनका मशहूर डायलॉग “दूध-जलेबी खाएंगे, खंडवा में बस जाएंगे”आज भी लोगों की जुबान पर है. खंडवा का ‘गौरीकुंज’ आज भले जर्जर हो, लेकिन वह आज भी संगीत प्रेमियों के लिए तीर्थ से कम नहीं.
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अशोक कुमार हिंदी सिनेमा के दादा मुनि किशोर कुमार के बड़े भाई अशोक कुमार, जिन्हें पूरा देश दादा मुनि के नाम से जानता है, उनका जीवन भी खंडवा से गहराई से जुड़ा रहा. उनके पिता कुंजीलाल गांगुली खंडवा में वकील थे. यहीं से उनका परिवार जुड़ा और यहीं से सपनों ने उड़ान भरी.मुंबई जाकर अशोक कुमार ने हिंदी सिनेमा को नई पहचान दी और एक के बाद एक सुपरहिट फिल्में दीं. आज भी खंडवा को लोग किशोर-अशोक कुमार की नगरी के रूप में पहचानते है.

माखनलाल चतुर्वेदी कलम के सिपाही खंडवा केवल फिल्म और भक्ति ही नहीं, बल्कि क्रांतिकारी पत्रकारिता की धरती भी रही है. महान स्वतंत्रता सेनानी और साहित्यकार माखनलाल चतुर्वेदी की कर्मभूमि खंडवा रही. यहीं से उन्होंने ‘प्रभा’ और ‘कर्मवीर’ जैसी पत्रिकाओं का संपादन कर अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी.उनकी लेखनी इतनी तेज थी कि ब्रिटिश सरकार भी उनसे डरती थी. इतिहास गवाह है कि महात्मा गांधी भी 1930 में खंडवा आए थे, जहां उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी से आंदोलन को लेकर चर्चा की थी.आज खंडवा में उनकी प्रतिमा और कर्मवीर विद्यापीठ उनकी विरासत की याद दिलाते हैं.

पद्मश्री रामनारायण उपाध्याय निमाड़ की आत्मा खंडवा जिले के कालमुखी गांव में जन्मे रामनारायण उपाध्याय ‘रामा दादा’ निमाड़ की लोक-संस्कृति की आत्मा माने जाते हैं. उन्होंने हिंदी और निमाड़ी भाषा में 30 से अधिक पुस्तकें लिखीं.वे गांधीवादी विचारधारा के प्रबल समर्थक थे और जीवनभर सादगी, सत्य और सेवा के मार्ग पर चले. उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री सम्मान से नवाजा. आज भी निमाड़ की संस्कृति की बात होती है, तो रामा दादा का नाम सम्मान से लिया जाता है.

आशीष दवे मीडिया की मजबूत आवाज देश के जाने-माने एंकर और मीडिया पर्सनालिटी आशीष दवे का भी खंडवा से गहरा जुड़ाव रहा है. उन्होंने अपनी पत्रकारिता की शुरुआती पहचान खंडवा से ही बनाई.‘नई दुनिया’ अखबार में छपने वाली उनकी खबरें उस दौर में शहर में चर्चा का विषय बनती थीं. आशीष दवे आज भी कहते हैं कि उनकी भाषा, अंदाज और पहचान सब कुछ खंडवा की गलियों से निकला है.