50 गांवों की खेती हरी, लेकिन 300 लोगों का खानपुर वीरान, बांध की बढ़ती लहरों में क्यों खो गया गांव का इतिहास

50 गांवों की खेती हरी, लेकिन 300 लोगों का खानपुर वीरान, बांध की बढ़ती लहरों में क्यों खो गया गांव का इतिहास


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Historic Khanpur Village: खानपुर गांव कभी प्रकृति का खुद को सबसे बड़ा तोहफा मानता था. अब वह गांव वीरान हो गया है, जहां कभी लोगों की चहल-पहल हुआ करती थी. अब वह ऐतिहासिक गांव का अस्तित्व उजड़ गया है और पानी में डूब गया.

Historic Khanpur Village: सागर में 385 करोड़ की लागत से सतगढ़ मध्यम सिंचाई परियोजना का काम लगभग पूरा हो गया है. इस परियोजना से 50 गांव के किसानों की 20000 हैकटेयर भूमि सिंचित होगी. साथ ही 100 गांव के लोगों को नल जल योजना से पानी की आपूर्ति की जाएगी. एक तरफ जहां यह परियोजना किसानों को समृद्ध बनाएगी कई गांव के लोगों के कंठ की प्यास मिटाएगी तो दूसरी तरफ वह गांव भी हैं, जिन्हें अपने पूर्वजों की विरासत, अपने मां-बाप के साथ बिताए हुए क्षण, बच्चों के बड़े होने की यादें, खेल कूद नाच गाना पढ़ना लिखना शादी विवाह जीवन मरण जैसे किस्से कहानियों से जुड़े हुए न सिर्फ घर को बल्कि पूरे गांव को ही छोड़ना पड़ा है और वह दुर्भाग्यशाली गांव खानपुर है. जो खानपुर गांव कभी प्रकृति का खुद को सबसे बड़ा तोहफा मानता था क्योंकि यहां जंगल, नदी, पहाड़ झरना, खेती, जानवर पुरातात्विक संपदा, किला, महल, संस्कृति सब कुछ हुआ करता था. अब वह गांव वीरान हो गया है, जहां कभी लोगों की चहल-पहल हुआ करती थी अब वह उजड़ गया है जहां कभी बच्चों की खिलखिलाहट गूंजती थी अब वो मकान वो घर खंडहर में बदल गए, बांध का पानी गांव की सीमा में भी पहुंच गया और जल्द ही यह उसमें डूब भी जाएगा.

दरअसल, सतगढ़ सिंचाई परियोजना का काम पूरा हो गया है और अबकी बार होने वाली बारिश में यह बांध पूरी तरह पानी से लबालब भर जाएगा जिसमें ऐतिहासिक खानपुर गांव भी जलमग्न हो जाएगा. इसी को देखते हुए पहले ही इस पूरे गांव को खाली कर दिया गया है गांव खाली होने से जो कच्चे मकान थे वह पिछली बारिश में ही ढह गए और मिट्टी के ढेर में बदल गए. क्योंकि लोग अपने घरों से खप्पर निकाल ले गए जो पक्के घर थे उनमें से वह छत को तोड़कर एट निकाल ले गए जिनके घरों में फारसी थी वह उसको ले गए और अब यह मलबे की ढेर में बदल गए.

300 लोगों की आबादी वाला था गांव
बेरखेड़ी सुवंश पंचायत में आने वाला खानपुर करीब 300 लोगों की आबादी वाला गांव था जिसमें 80 फ़ीसदी आदिवासी लोग इसका हिस्सा थे, जो बरसों से परंपरागत रूप से यहां पर बसे हुए थे और अपनी विरासत को आगे बढ़ा रहे थे यह यहां के जंगल में पाई जाने वाली जड़ी बूटियां को तोड़कर लाने बेचने और भेड़ बकरियों को पालकर ही अपना जीवन यापन कर रहे थे. इसका अंदाजा ऐसी लगा सकते हैं कि इस गांव की और खेती की कुल भूमि 55 हैकटेयर थीं अधिकांश लोग प्रकृति पर ही निर्भर थे.

खानपुर गांव के किसान गोविंद सिंह ठाकुर बताते हैं कि कोई भी अपने घर में गांव में कितनी भी परेशानी से जूझ रहा हो लेकिन वह उसे कभी छोड़ना नहीं चाहता मजबूरी में हम लोग घर द्वार छोड़कर गए हैं इसके लिए प्रशासन के द्वारा मुआवजा भी दिया गया जो कुछ इस प्रकार है, उसमें जिनके कच्चे मकान थे उनके लिए 3000 स्क्वायर फीट के हिसाब से जिनके पक्के मकान थे उनके लिए 6000 स्क्वायर फीट के हिसाब से मुआवजा दिया गया है जिनकी खेती संचित थी उनके लिए 9 लाख रुपया प्रति एकड़ और जिनकी जमीन संचित नहीं थी उनके लिए 6 लाख रुपया प्रीति एकड़ के हिसाब से मुआवजा दिया गया है, इसके साथ ही इन 86 परिवारों को 20 वाई 50 के प्लाट भी राजस्व की भूमि में दिए गए हैं. जहां अलग से पुनर्वास कॉलोनी बसाई जा रही है.

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Deepti Sharma

Deepti Sharma, currently working with News18MPCG (Digital), has been creating, curating and publishing impactful stories in Digital Journalism for more than 6 years. Before Joining News18 she has worked with Re…और पढ़ें

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खानपुर की सुनहरी यादें अब मलबे में, गांव का वजूद पानी में क्यों डूबा



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