चंद रुपयों में बच जाएगी खरबूजे की फसल, एक्सपर्ट के टिप्स से हो जाओगे मालामाल

चंद रुपयों में बच जाएगी खरबूजे की फसल, एक्सपर्ट के टिप्स से हो जाओगे मालामाल


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चंद रुपयों में बच जाएगी खरबूजे की फसल, एक्सपर्ट के टिप्स से हो जाओगे मालामाल

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Agriculture News: विशेषज्ञों के अनुसार, खरबूजे में मुख्य रूप से पाउडरी मिल्ड्यू और डाउनी मिल्ड्यू जैसी फफूंदजनित बीमारियां गंभीर नुकसान पहुंचाती हैं. डाउनी मिल्ड्यू आमतौर पर फूल आने के समय लगती है.

सतना. विंध्य क्षेत्र में परंपरागत फसलों के साथ अब नकदी फसल के रूप में खरबूजे की खेती किसानों के लिए फायदे का सौदा साबित हो रही है. जैसे ही गर्मियों की शुरुआत होती है, वैसे ही सतना जिले में खरबूजे की मांग तेजी से बढ़ जाती है और इसी के साथ सक्रिय हो जाता है बकिया बांध के आसपास का बड़ा थोक बाजार, जो अब क्षेत्र की पहचान बन चुका है. कम समय में तैयार होने वाली यह फसल किसानों को सीधी नकद आय देती है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है. अनुकूल जलवायु, दोमट मिट्टी और अच्छी जल निकासी वाली जमीन इस फसल के लिए बेहद उपयुक्त मानी जाती है. यही कारण है कि टमस नदी के किनारे वाले इलाकों में इसका उत्पादन अधिक होता है और यहां से प्रदेश के बड़े बाजारों समेत आसपास के जिलों में सप्लाई की जाती है.

लोकल 18 से बातचीत में सतना के जय श्री कृषि विकास केंद्र के कीटनाशक विशेषज्ञ अमित सिंह ने बताया कि सतना में बकिया डैम के चारों तरफ करीब 8 से 10 गांवों के किसान बड़े पैमाने पर खरबूजे की खेती करते हैं. सही तकनीक अपनाने पर प्रति एकड़ अच्छा मुनाफा संभव है लेकिन इस फसल में कीट और रोग का खतरा लगातार बना रहता है. खासकर शुरुआती अवस्था में पत्ती काटने वाला कीड़ा पौधा जमते ही नुकसान पहुंचाना शुरू कर देता है. इसके अलावा फल मक्खी, माइट्स, थ्रिप्स और ककड़ी बीटल भी फसल को प्रभावित करते हैं.

डाउनी और पाउडरी मिल्ड्यू से सबसे ज्यादा खतरा
विशेषज्ञों के अनुसार, खरबूजे में मुख्य रूप से डाउनी मिल्ड्यू और पाउडरी मिल्ड्यू जैसी फफूंदजनित बीमारियां गंभीर नुकसान पहुंचाती हैं. डाउनी मिल्ड्यू आमतौर पर फूल आने के समय लगती है, जिसमें पत्तियों के ऊपरी हिस्से पर पीले और नीचे की तरफ भूरे-स्लेटी रंग के धब्बे दिखाई देते हैं क्योंकि नम मौसम में यह तेजी से फैलती है. वहीं पाउडरी मिल्ड्यू में पत्तियों और तनों पर सफेद पाउडर जैसी परत जम जाती है. समय पर नियंत्रण नहीं करने पर पूरी फसल खराब हो सकती है और उत्पादन पर भारी असर पड़ता है.

150 से 500 रुपये खर्च कर बचाई जा सकती है फसल
अमित ने आगे बताया कि जब खरबूजे में 6 से 10 पत्तियां निकल आती हैं और फूल आने लगते हैं, उसी समय इन बीमारियों का प्रकोप बढ़ता है. ऐसे में प्लांटोमाइसिन, नैटीगो और फास्पोकॉप जैसे फफूंदनाशी लाभकारी साबित होते हैं. फास्पोकॉप 300 मिली प्रति एकड़ की दर से उपयोग होता है, जिसकी कीमत बाजार में लगभग 300 से 450 रुपये है. प्लांटोमाइसिन 100 ग्राम प्रति एकड़ के हिसाब से 150 से 200 रुपये तक मिल जाता है जबकि नैटीगो 50 ग्राम प्रति एकड़ की मात्रा में 400 से 500 रुपये तक उपलब्ध है. 2 से 3 स्प्रे में इन दवाओं से फफूंद का प्रभाव नियंत्रित किया जा सकता है.

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि थोड़ी सी सतर्कता और सीमित लागत में समय पर दवा प्रबंधन अपनाकर किसान अपनी मेहनत को सुरक्षित रख सकते हैं. बढ़ती मांग और तैयार बड़े बाजार के बीच यदि रोग और कीट प्रबंधन सही तरीके से किया जाए, तो खरबूजे की खेती सतना के किसानों के लिए लंबे समय तक मालामाल करने वाली फसल साबित हो सकती है.

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Rahul Singh

राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.



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