‘स्वर्ग से नरक तक’ 6 महीने में उजड़ गया पूरा गांव, 80 आदिवासी परिवार बेघर

‘स्वर्ग से नरक तक’ 6 महीने में उजड़ गया पूरा गांव, 80 आदिवासी परिवार बेघर


MP News: एक टूटी-सी झोपड़ी… सामने जलता चूल्हा… बगल में सूखी लकड़ियों पर डला बिस्तर… एक नीला ड्रम और दो-चार बर्तन. खड़े होने तक की ठीक से जगह नहीं. कच्ची ईंटों को दो-तीन फीट ऊंचा रखकर ऊपर बरसाती डाल दी गई है यही अब “घर” है. इसी में महारानी आदिवासी अपने पांच लोगों के परिवार के साथ रह रही हैं.

ये सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि खानपुर गांव के 80 से ज्यादा आदिवासी परिवारों की हकीकत है, जिन्हें एक सिंचाई परियोजना ने उजाड़ दिया.

डूब क्षेत्र में आया गांव, सब कुछ छोड़ना पड़ा
छह महीने पहले तक ये लोग हरियाली, नदी और जंगल के बीच रहते थे. पक्के घर थे, रोज़गार था, पुरखों की यादें थीं. लेकिन सतगढ़ सिंचाई मध्यम परियोजना के बांध निर्माण की जद में गांव आ गया. गांव डूब क्षेत्र घोषित हुआ और लोगों को सब कुछ छोड़कर जाना पड़ा. सरकार और कंपनियों ने बड़े-बड़े वादे किए. कहा गया कि बेहतर मकान, सुविधाएं और रोजगार मिलेगा. लेकिन विस्थापितों का आरोप है कि काम पूरा होने के बाद कोई पलटकर देखने तक नहीं आया.

मुआवजा मिला, पर जिंदगी नहीं संभली
गांव के गोविंद सिंह बताते हैं कि सिंचित जमीन के लिए 9 लाख प्रति एकड़ और असिंचित के लिए 6 लाख प्रति एकड़ मुआवजा मिला. कच्चे-पक्के मकानों का भी हिसाब से भुगतान हुआ. खानपुर से करीब 6 किलोमीटर दूर सिलेरा गांव में प्लॉट दिए गए, जहां अगस्त में लोग आकर बस गए. लेकिन मुआवजे का पैसा ज्यादातर कर्ज चुकाने, इलाज या बच्चों की शादी में खर्च हो गया. अब नए सिरे से घर बनाने के लिए कुछ बचा ही नहीं.

जंगल छूटा, रोज़गार भी गया
तुलसीराम आदिवासी कहते हैं कि पहले जंगल था, लकड़ी मिलती थी, मजदूरी मिल जाती थी. अब यहां ना जंगल है, ना काम. पैसा भी खत्म हो गया. आगे जिंदगी कैसे चलेगी, समझ नहीं आ रहा. 300 आबादी वाले इस गांव के पास सिर्फ 120 एकड़ जमीन थी. दो परिवारों के पास ही 42 एकड़ जमीन है. बाकी लोग मजदूरी पर निर्भर थे. अब कई परिवारों ने अपने बच्चों को काम के लिए दूर भेज दिया है.

उजड़ा घर, टूटा भरोसा
जिस गांव को लोग जन्नत कहते थे, वह अब पानी में डूब जाएगा. लेकिन उससे पहले ही इनकी जिंदगी डूब चुकी है. कच्ची झोपड़ी में गुजर-बसर कर रहे ये परिवार अब सिर्फ एक सवाल पूछ रहे हैं क्या विकास की कीमत हमेशा गरीब ही चुकाएगा?



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