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Chhatarpur ardhakwari mata mandir : आज हम आपको एक ऐसे चमत्कारी माता के मंदिर की कहानी बताने जा रहे हैं. जिसे सैकड़ो साल पुराना बताया जाता है. मान्यता है कि इस मंदिर में जो भी मनोकामना लेकर आता है उसकी मनोकामनापर्ण होती है. जीवन देती है कि यहां जो माता विराजमान हैं वह आधी क्वारी और आधी ब्याही हैं. इसी के चलते उन्हें अर्द्धक्वारी माता के नाम से जाना जाता है.
MP News : छतरपुर जिले के बारीगढ़ में माता का एक ऐसा मंदिर भी है जिसे सैकड़ो सालों साल पुराना बताया जाता है. यह मंदिर जंगल-पहाड़ में स्थित है लेकिन आज भी मान्यता है कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूरी होती हैं. जिन श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूरी होती हैं, वो यहां आकर सांग चढ़ाते हैं. साथ ही चेचक के मरीज अस्पताल न जाकर मंदिर आकर ठीक होते हैं. जिनको संतान प्राप्ति नहीं होती हैं उन्हें संतान प्राप्ति का सुख मिलता है.
65 वर्षीय पुजारी रामफल शर्मा लोकल 18 से बातचीत में बताते हैं कि माता का जो यह मंदिर है, इसे अर्द्धक्वारी माता के नाम से जाना जाता है. ये मंदिर सैकड़ों साल पुराना बताया जाता है. हम इस मंदिर को पीढ़ियों से पूजते आए हैं. हमारे बाबा के बाबा भी इस मंदिर में पूजा-अर्चना करते आए हैं. हालांकि, जंगल-पहाड़ में मंदिर होने की वज़ह से हर दिन लोग नहीं आ पाते हैं लेकिन हर सोमवार को यहां सुबह श्रद्धालु आते हैं. साथ ही शारदीय और चैत्र नवरात्रि में यहां जवारे रखे जाते हैं. जिनकी मनोकामनाएं पूर्ण हुई हैं वह यहां नवरात्रि में आते हैं. इसके अलावा यहां मनोकामनाएं मांगने हजारों श्रद्धालु नवरात्रि में आते हैं.
पाताल फोड़कर निकली माता
पुजारी बताते हैं कि यहां जो माता विराजमान हैं वह पाताल फोड़कर प्रकट हुई हैं. ये कितने साल पुरानी हैं यह तो हमारे बाबा को भी नहीं पता था. आसपास के गांव में जिनके यहां शादी होती हैं वह जोड़े के रूप में आकर यहां हत्था लगाते हैं.
प्राचीन स्थल में नहीं विकास
वहीं स्थानीय निवासी रुपेश तिवारी बताते हैं कि पहले माता जी का प्राचीन स्थान बड़ी चट्टान के नीचे था लेकिन किन्हीं कारणवश सालों पहले माता जी का स्थान परिवर्तित कर दिया गया. हालांकि, प्राचीन स्थान होने के बाद भी यहां रात में लाईट भी नहीं जलती है. जबकि यहां बिजली खंभे और लाइट भी लगी हैं.
रोग होते ठीक
स्थानीय निवासी रोहित चौरसिया बताते हैं कि हमारे यहां माता जी का जो प्राचीन स्थान है वह बहुत प्रसिद्ध स्थान हैं. हालांकि, जंगल-पहाड़ क्षेत्र होने की वज़ह से लोग हर दिन नहीं जा पाते हैं लेकिन जब भी किसी के घर में शादी-विवाह जैसे कार्यक्रम होते हैं वह यहीं आते हैं. यहां बच्चों का मुंडन भी होता है. यहां नवरात्रि में मेला भी लगता है. इसके अलावा यहां चेचक के मरीज भी ठीक होकर जाते हैं.
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7 वर्षों से पत्रकारिता में अग्रसर. इलाहबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स इन जर्नालिस्म की पढ़ाई. अमर उजाला, दैनिक जागरण और सहारा समय संस्थान में बतौर रिपोर्टर, उपसंपादक औऱ ब्यूरो चीफ दायित्व का अनुभव. खेल, कला-साह…और पढ़ें