धार भोजशाला परिसर को लेकर चल रही सुनवाई के दौरान सोमवार को मुस्लिम पक्ष ने अपने विस्तृत तर्क प्रस्तुत किए। मुस्लिम पक्ष की ओर से एडवोकेट अशहर वारसी ने ऐतिहासिक दस्तावेजों, सरकारी अभिलेखों और गजट सूचनाओं के आधार पर अपना पक्ष रखा।
.
एडवोकेट वारसी ने दलील दी कि वर्ष 1904 से पहले तक इस परिसर पर मुस्लिम समुदाय का सतत और अनुपातिक कब्जा रहा है। उन्होंने सरकारी रिकॉर्ड, गजट नोटिफिकेशन और पुरातत्व विभाग के तत्कालीन डायरेक्टर द्वारा की गई टिप्पणियों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन अभिलेखों में स्थल को मस्जिद के रूप में दर्ज किया गया है।
उन्होंने विशेष रूप से 1935 के गजट नोटिफिकेशन का हवाला देते हुए कहा कि उसमें इस स्थल को मस्जिद माना गया है और अन्य गतिविधियों की अनुमति न देने का उल्लेख स्पष्ट रूप से दर्ज है। मुस्लिम पक्ष ने कुरान, हदीस और अन्य धार्मिक दस्तावेजों के साथ सरकारी अभिलेखों के आधार पर अपने दावे दोहराए।
तर्क दिया- सिविल प्रकृति का है विवाद
मुस्लिम पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि याचिकाकर्ता ने इस मामले को जनहित याचिका (PIL) की तरह प्रस्तुत किया है, जबकि यह विवाद सिविल प्रकृति का है और इसे सक्षम सिविल कोर्ट में भेजा जाना चाहिए।
सुनवाई में अभी इंटरवीनर्स की दलीलें अभी शेष हैं। मंगलवार को होने वाली सुनवाई में मुस्लिम पक्ष की ओर से सीनियर एडवोकेट सलमान खुर्शीद अपने तर्क प्रस्तुत करेंगे। वहीं सोमवार को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की ओर से भी सीनियर एडवोकेट सुनील जैन ने अपने तथ्य रखे, लेकिन समयाभाव के कारण उनकी दलील अधूरी रह गई, जिस पर सुनवाई मंगलवार को जारी रहेगी। कोर्ट सभी पक्षों से कहा है कि वे अपने-अपने दावों के समर्थन में दस्तावेजी साक्ष्य स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करें।