फॉरेस्ट अधिकारी से आश्रम सेवक बने एस.एन. शुक्ला, असहायों की सेवा में समर्पित किया जिंदगी

फॉरेस्ट अधिकारी से आश्रम सेवक बने एस.एन. शुक्ला, असहायों की सेवा में समर्पित किया जिंदगी


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शिवपुरी जिले में संचालित अपना घर आश्रम उन लोगों के लिए सहारा बना हुआ है, जिन्हें परिवार और समाज ने ठुकरा दिया. यहां विक्षिप्त, असहाय और निर्णयहीन अवस्था में पहुंचे है. इन लोगों की देखभाल सेवा-भाव से की जाती है .इसी आश्रम में पिछले डेढ़ वर्ष से एक ऐसे सेवक दिन-रात जुटे हैं

मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में संचालित अपना घर आश्रम उन लोगों के लिए सहारा बना हुआ है, जिन्हें परिवार और समाज ने ठुकरा दिया. यहां विक्षिप्त, असहाय और निर्णयहीन अवस्था में पहुंचे है. इन लोगों की देखभाल सेवा-भाव से की जाती है .इसी आश्रम में पिछले डेढ़ वर्ष से एक ऐसे सेवक दिन-रात जुटे हैं, जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी के अनुभवों को पीछे छोड़कर मानव सेवा को ही मोक्ष का मार्ग मान लिया है. उनका नाम एस.एन . शुक्ला है.

शुक्ला जी बताते हैं कि वे पहले सरकारी फॉरेस्ट विभाग में कार्यरत थे. नौकरी के दौरान जीवन सामान्य ढर्रे पर चल रहा था. लेकिन घर में आई कुछ विषम परिस्थितियों ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया. वह मूलता मैनपुरी के निवासी हैं. इसी दौरान वे मुंबई चले गए. वह मूलता मैनपुरी के निवासी हैं. जहाँ उन्हें अभिनय का शौक खींच ले गया. मुंबई में उन्होंने एक्टिंग भी की और शास्त्रों का अध्ययन जारी रखा. जीवन के इस उतार-चढ़ाव ने उन्हें यह सोचने पर मजबूर किया. अंततः मनुष्य को क्या साधना है?. भौतिक उपलब्धियाँ या आत्मिक शांति है.

आश्रम में निरंतर सेवा दे रहे
एक अवसर पर वे बागेश्वर धाम की शूटिंग के सिलसिले में गए. जहां उनकी मुलाकात आश्रम से जुड़े एक पदाधिकारी से हुई. बातचीत के दौरान उन्हें बताया गया कि अपना घर आश्रम में सेवा का अवसर है. शुक्ला जी ने मन बना लिया. अब शेष जीवन मानव सेवा, गौ सेवा और प्रभु भक्ति को समर्पित करेंगे. वे कहते है कि मैं अब 64 वर्ष का हो चुका था. मेरी दो बेटियां हैं, बेटा नहीं है. मोक्ष प्राप्ति का सच्चा मार्ग सेवा ही है. पिछले डेढ़ साल से वे आश्रम में निरंतर सेवा दे रहे हैं. उनका काम केवल रोगियों की देखभाल तक सीमित नहीं है. वे स्वयंसेवकों की उपस्थिति देखना, रिपोर्ट बनाना, कार्यालय व्यवस्था संभालना, मंदिर की व्यवस्था देखना. गौशाला की निगरानी जैसे अनेक दायित्व निभाते हैं. ये लोग असहाय हैं. इस निर्णय लेने की स्थिति में नहीं हैं. जब हम इनकी सेवा करते हैं, तो सच में लगता है कि प्रभु का वास है.

अधिकांश समय आश्रम को समर्पित
आज जब अधिकांश लोग 60 की उम्र के बाद भी कमाई और सुख-सुविधाओं के पीछे भागते हैं, शुक्ला जी ने उस दौड़ से खुद को अलग कर लिया है. वे कहते हैं कि अब मैं भौतिक बातों से दूर होता जा रहा हूँ. मुझे केवल आश्रम, मानव सेवा और गौ सेवा ही दिखाई देती है. यही मेरे लिए मोक्ष का सबसे बड़ा साधन है. वे समय-समय पर अपनी बेटियों से मिलने जाते हैं, लेकिन उनका अधिकांश समय आश्रम को समर्पित रहता है.नाते-रिश्तों और सामाजिक आयोजनों में उनकी भागीदारी अब बहुत कम हो गई है. यदि कोई दुखद सूचना आती है, तो वे जाते हैं, अन्यथा उनका दिन-रात आश्रम में ही बीतता है. वे मानते हैं कि यहां सेवा करते हुए उन्हें एक अलग तरह की आत्मिक शांति मिलती है, जो किसी भी भौतिक सुख से बढ़कर है.एस.ए. शुक्ला जैसे लोग यह साबित करते हैं कि जीवन के किसी भी पड़ाव पर इंसान नई दिशा चुन सकता है. मोह-माया से ऊपर उठकर, दूसरों के लिए जीना ही सच्ची साधना है. अपना घर आश्रम में उनकी निःस्वार्थ सेवा उन सभी के लिए प्रेरणा है, जो जीवन में सच्चे अर्थ की तलाश में हैं.



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