19 साल की उम्र में टेस्ट डेब्यू पर शतक, 23 की आयु में निधन

19 साल की उम्र में टेस्ट डेब्यू पर शतक, 23 की आयु में निधन


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आर्ची जैक्सन का उदय किसी परिकथा जैसा था मात्र 15 साल की उम्र में, जब बच्चे स्कूल की पढ़ाई में व्यस्त होते हैं, जैक्सन ऑस्ट्रेलिया में ‘फर्स्ट-ग्रेड’ क्रिकेट खेल रहे थे. उनकी बल्लेबाजी में एक ऐसी नफासत और सहजता थी, जो दशकों में किसी एक खिलाड़ी में दिखती है. 

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ऑस्ट्रेलिया के आर्ची जैक्सन ने 19 साल की उम्र में ठोंका पहले टेस्ट में शतक, 23 साल में उनका निधन, ब्रैडमैन से होती थी तुलना

नई दिल्ली.  क्रिकेट की दुनिया में जब भी ऑस्ट्रेलिया और महानता की बात होती है, तो सर डॉन ब्रैडमैन का नाम सबसे पहले आता है लेकिन इतिहास के पन्नों में एक ऐसा नाम दर्ज है, जिसे खुद ब्रैडमैन अपना प्रतिद्वंदी और बेहद प्रतिभाशाली मानते थे  एक ऐसा खिलाड़ी जिसने 19 साल की उम्र में दुनिया को अपना दीवाना बना लिया, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था. यह कहानी है ‘आर्ची जैक्सन’ की, जिन्हें क्रिकेट का ‘खोया हुआ राजकुमार’ कहा जाता है.

आर्ची जैक्सन का उदय किसी परिकथा जैसा था मात्र 15 साल की उम्र में, जब बच्चे स्कूल की पढ़ाई में व्यस्त होते हैं, जैक्सन ऑस्ट्रेलिया में ‘फर्स्ट-ग्रेड’ क्रिकेट खेल रहे थे. उनकी बल्लेबाजी में एक ऐसी नफासत और सहजता थी, जो दशकों में किसी एक खिलाड़ी में दिखती है.

एक असाधारण शुरुआत

1929 में इंग्लैंड के खिलाफ अपने टेस्ट डेब्यू पर उन्होंने 164 रनों की यादगार पारी खेली. उस समय वे टेस्ट शतक लगाने वाले सबसे युवा खिलाड़ी बने थे. उनकी तुलना अक्सर महान विक्टर ट्रम्पर से की जाती थी. जैक्सन के खेलने का अंदाज इतना कलात्मक था कि आलोचक और प्रशंसक समान रूप से उनके मुरीद थे.  यहाँ तक कि ब्रैडमैन के उदय के शुरुआती दिनों में, कई जानकारों का मानना था कि जैक्सन तकनीक और स्टाइल के मामले में ब्रैडमैन से कहीं आगे हैं.

जब समय ने करवट ली

जहाँ 1930 में डॉन ब्रैडमैन रनों के अंबार लगा रहे थे और विश्व रिकॉर्ड तोड़ रहे थे, वहीं दूसरी ओर आर्ची जैक्सन एक अदृश्य दुश्मन से लड़ रहे थे खराब स्वास्थ्य।. जैक्सन को ट्यूबरकुलोसिस (टीबी) ने जकड़ लिया था.  जिस शरीर को मैदान पर चौके-छक्के लगाने थे, वह धीरे-धीरे कमजोर पड़ता जा रहा था. मैच छूटते गए, रन कम होते गए और एक चमकता हुआ करियर ढलने लगा. जैक्सन ने मैदान पर वापसी की पूरी कोशिश की, लेकिन बीमारी उनकी प्रतिभा पर भारी पड़ रही थी.

एक दुखद अंत और महान विदाई

मात्र 23 वर्ष की आयु में, जब एक क्रिकेटर अपने करियर के शिखर की ओर बढ़ता है, आर्ची जैक्सन दुनिया को अलविदा कह गए. उनकी मृत्यु ने पूरे ऑस्ट्रेलिया को झकझोर कर रख दिया. उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके अंतिम संस्कार में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए थे.  क्रिकेट इतिहास का सबसे भावुक पल वह था जब खुद डॉन ब्रैडमैन ने अपने इस मित्र और प्रतिद्वंदी के ताबूत को कंधा दिया.  उनकी कब्र पर आज भी एक बहुत ही सरल लेकिन मार्मिक पंक्ति लिखी है: “He played the game” (उन्होंने खेल खेला)। यह चार शब्द उनके पूरे जीवन और खेल के प्रति उनके समर्पण का सार हैं.

आर्ची जैक्सन केवल आंकड़ों का नाम नहीं हैं, बल्कि वे एक ‘क्या हो सकता था’ (What if) की कहानी हैं.  अगर बीमारी ने उन्हें न घेरा होता, तो शायद आज क्रिकेट के रिकॉर्ड्स की किताबें कुछ अलग ही कहानी बयां करतीं.  जैक्सन हमें याद दिलाते हैं कि खेल केवल जीतने या हारने का नाम नहीं है, बल्कि उस गरिमा और शैली का है जिससे आप इसे खेलते हैं.



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