कभी ड्राइवरी तो कभी की बटाई, गांव वालों से लोने लेकर बेटे को बनाया MBBS डॉक्टर

कभी ड्राइवरी तो कभी की बटाई, गांव वालों से लोने लेकर बेटे को बनाया MBBS डॉक्टर


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बालाघाट से 22 किलोमीटर दूर मगरदर्रा गांव से देखने को मिली जहां पर सुविधाओं के अभाव में एक आदिवासी युवक एमबीबीएस डॉक्टर बना. हाल ही में उनका दीक्षांत समारोह हुआ, जहां पर मजदूरी कर अपने बेटे को डिग्री हासिल करता देख फूले नहीं समाए. अब इलाके में उस युवक की चर्चा हो रही है कि गांव से निकलकर लंबे संघर्ष के बाद अपने सपने को हासिल कर गांव ही नहीं बल्कि जि

बालाघाट. एक समय था जब बालाघाट नक्सलवाद को लेकर सुर्खियों में रहता था. लेकिन अब उसी जिले प्रतिभाएं निखर आ रही है, जो न सिर्फ जिले में अपना नाम रोशन कर रहे हैं बल्कि पूरे प्रदेश में अलग ही स्थान रखती है. एक ऐसी ही कहानी बालाघाट से 22 किलोमीटर दूर मगर दर्रा गांव से देखने को मिली जहां पर सुविधाओं के अभाव में एक आदिवासी युवक एमबीबीएस डॉक्टर बना. हाल ही में उनका दीक्षांत समारोह हुआ, जहां पर मजदूरी कर अपने बेटे को डिग्री हासिल करता देख फूले नहीं समाए. अब इलाके में उस युवक की चर्चा हो रही है कि गांव से निकलकर लंबे संघर्ष के बाद अपने सपने को हासिल कर गांव ही नहीं बल्कि जिले का नाम रोशन किया है. जानिए उस युवक के संघर्ष की कहानी…

बालाघाट से 22 किलोमीटर दूर मगर दर्रा नाम का गांव है, जहां पर मर्सकोले परिवार रहता है. उसी परिवार में निकेश का जन्म होता है. वह बचपन से पढ़ाई में होनहार था. शुरुआत की पढ़ाई गांव के ही स्कूल में पूरी की. फिर वह बालाघाट आया और यहां से कुछ समय तक पढ़ाई की. फिर जबलपुर के सरकारी कॉलेज से बीएससी की पढ़ाई की उसके बाद नीट परीक्षा में चयन हुआ और इंदौर के कॉलेज से एमबीबीएस की पढ़ाई शुरु कर दी. अब जाकर इतने सालों की मेहनत सफल हुई और वह एमबीबीएस डॉक्टर बन गया. अब निकेश मर्सकोले का सपना है कि वह एमडी की पढ़ाई बाल रोग विशेषज्ञ बन जाए. निकेश की सफलता के पीछे उनके माता पिता का कड़ा संघर्ष रहा है.

कभी ट्रैक्टर चलाया तो कभी बटाई की
निकेश सफलता के पीछे उनके माता-पिता का कड़ा संघर्ष रहा है. उनके पिता चंदू लाल मर्सकोले ने बताया कि निकेश को डॉक्टर बनाने के लिए दिन रात कड़ी मेहनत की और निकेश को पढ़ाने के लिए पैसे जुटाए. उन्होंने बताया कि उन्होंने कभी गाय चराई, तो कभी ट्रैक्टर चलाकर परिवार का भरण पोषण किया. वहीं, अब खेती भी ज्यादा नहीं थी, तो दूसरों की खेती में मजदूरी और बटाई का भी काम किया. उनकी मां ने बताया कि निकेश में पहले से ही प्रतिभा थी. लेकिन हम चिंतित रहते थे कि उसकी प्रतिभा के साथ न्याय हो पाएगा या नहीं. ऐसे में मजदूरी करें और बेटे को पूर्ति करें. ऐसे में अब उनका लक्ष्य पूरा किया.

गांव के समूह से लोन लेकर पढ़ाया
निकेश की मां दुर्गा बाई मर्सकोले ने बताया कि उन्होंने बेटे को पढ़ाने के लिए बहुत कुछ झेला, जिसे शब्दों में नहीं बताया जा सकता है. आर्थिक रूप से परिवार कमजोर था. ऐसे में पति पत्नी के भरोसे ही परिवार का गुजारा चलता था. ऐसे में निकेश को पढ़ाने के लिए पैसे नहीं थे तब गांव में चलने वाले स्व सहायता समूह से लोन लिया और बच्चे को पढ़ाया. अब उन्हें उम्मीद है कि बेटे के डॉक्टर बन जाने से परिवार के हालात सुधरेंगे. ये हमारे लिए सुखद है.

घर ही नहीं गांव में भी खुशी का माहौल
गांव के पूर्व सरंपच श्याम सिंह चौहान का कहना है वह बचपन से ही प्रतिभाशाली रहा है. निकेश ने बता दिया कि प्रतिभा सुविधाओं की मोहताज नहीं होती है. इसके पीछे उनके माता-पिता के संघर्ष की भी तारीफ है. निकेश ने न सिर्फ गांव का नाम रोशन किया है बल्कि पूरे बालाघाट का नाम रोशन किया है. ये कहानी युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा का काम करेगी.

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Mohd Majid

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