मई में करें इन 5 औषधीय फसलों की खेती, कम लागत में लाखों कमाने का मौका

मई में करें इन 5 औषधीय फसलों की खेती, कम लागत में लाखों कमाने का मौका


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मई में करें इन 5 औषधीय फसलों की खेती, कम लागत में लाखों कमाने का मौका

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Agriculture News: औषधीय खेती करने से पहले किसान भाइयों को उन कंपनियों से संपर्क कर लेना चाहिए, जो इन फसलों के बाय-प्रोडक्ट बनाती हैं. इससे उत्पादन का पहले से ही बाजार तय हो जाता है और किसानों को सही दाम मिल जाते हैं.

सतना. मई का महीना किसानों के लिए सिर्फ गर्मी का मौसम नहीं बल्कि कम लागत में ज्यादा मुनाफा कमाने का सुनहरा अवसर लेकर आता है. पारंपरिक खेती के मुकाबले अब औषधीय खेती तेजी से किसानों की पहली पसंद बनती जा रही है क्योंकि इसमें कम पानी, कम संसाधन और बेहतर बाजार उपलब्ध होता है. अश्वगंधा, शतावर, लेमनग्रास, तुलसी और सफेद मूसली जैसी फसलें न केवल कम समय में तैयार होती हैं बल्कि आयुर्वेदिक और हर्बल उत्पादों की बढ़ती मांग के चलते इनके दाम भी बाजार में ऊंचे बने रहते हैं. यही वजह है कि किसान अब आधुनिक तरीके अपनाकर औषधीय खेती से लाखों रुपये तक की कमाई कर रहे हैं.

औषधीय खेती में सफलता के लिए खेत की सही तैयारी बेहद जरूरी मानी जाती है. विशेषज्ञों के अनुसार, खेत की दो से तीन बार गहरी जुताई करनी चाहिए. पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से और इसके बाद हैरो या कल्टीवेटर से करनी चाहिए ताकि मिट्टी पूरी तरह भुरभुरी हो जाए. मई की तेज धूप में खेत को 10 से 15 दिन तक खुला छोड़ देना चाहिए, जिससे मिट्टी में मौजूद हानिकारक कीट और फफूंद नष्ट हो जाते हैं. इस प्रक्रिया को धूप उपचार कहा जाता है, जो फसल की गुणवत्ता को बेहतर बनाती है.

ड्रेनेज और क्यारियों का सही प्रबंधन जरूरी
अश्वगंधा, शतावर और सफेद मूसली जैसी औषधीय फसलों के लिए जल निकासी की व्यवस्था बेहद जरूरी होती है. खेत में पानी जमा होने से फसल खराब हो सकती है, इसलिए किसानों को उठी हुई क्यारियां या मेड़ बनाकर खेती करनी चाहिए. मेड़ से मेड़ की दूरी 50 से 60 सेंटीमीटर रखना उपयुक्त माना जाता है. इसके साथ ही खेत को समतल करने के लिए पाटा लगाना जरूरी है ताकि पानी का संतुलित प्रवाह बना रहे.

सिंचाई के आधुनिक तरीकों से बढ़ेगा उत्पादन
मई के अंत में बुवाई या नर्सरी लगाने से पहले सिंचाई की उचित व्यवस्था करना बेहद जरूरी है. ड्रिप सिस्टम या स्प्रिंकलर विधि का उपयोग करने से पानी की बचत के साथ-साथ पौधों को आवश्यक नमी मिलती रहती है. शुरुआती दिनों में हल्की सिंचाई की जरूरत होती है, जिससे पौधों की वृद्धि बेहतर होती है और उत्पादन में वृद्धि होती है.

औषधीय खेती बन रही गेम चेंजर
सतना के रामपुर के किसान अंशुमान सिंह ने लोकल 18 को बताया कि औषधीय खेती कम लागत और ज्यादा मुनाफे का बेहतरीन विकल्प है. पारंपरिक खेती के मुकाबले इसमें जोखिम कम है और बाजार की मांग लगातार बढ़ रही है. अगर किसान सही तकनीक और बाजार की समझ के साथ खेती करें, तो यह आय का स्थायी स्रोत बन सकती है. अश्वगंधा की खेती रेतीली और दोमट मिट्टी में अच्छी होती है और इसकी जड़ों और बीजों की बाजार में भारी मांग है. लेमनग्रास उन किसानों के लिए बेहतर विकल्प है, जिनके पास सिंचाई की सीमित सुविधा है क्योंकि इसे एक बार लगाने के बाद चार से पांच साल तक उत्पादन लिया जा सकता है. तुलसी की फसल तीन से चार महीने में तैयार हो जाती है और कम समय में तीन से चार गुना मुनाफा देती है. वहीं सफेद सोना कही जाने वाली सफेद मूसली किसानों को ज्यादा मुनाफा देने वाली फसल मानी जाती है.

बाजार से जुड़ाव ही असली सफलता की कुंजी
उन्होंने कहा कि औषधीय खेती करने से पहले किसानों को उन कंपनियों से संपर्क कर लेना चाहिए, जो इन फसलों के बाय-प्रोडक्ट बनाती हैं. इससे उत्पादन का पहले से ही बाजार तय हो जाता है और किसानों को उचित कीमत मिलती है. सही योजना, तकनीक और बाजार से जुड़ाव के साथ मई का महीना औषधीय खेती के लिए सच में गोल्डन पीरियड साबित हो सकता है.

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Rahul Singh

राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.



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