दो से ढाई हजार वाहनों की पार्किंग फिर बनेगी चुनौती: जिला कोर्ट; होप मिल की जमीन पर नहीं हो सकेगी पार्किंग – Indore News

दो से ढाई हजार वाहनों की पार्किंग फिर बनेगी चुनौती:  जिला कोर्ट; होप मिल की जमीन पर नहीं हो सकेगी पार्किंग – Indore News



अभी होप मिल की जमीन पर है जिला कोर्ट की पार्किंग। चार पहिया, दो पहिया यहीं पर खड़े किए जाते हैं।

जिला एवं सत्र न्यायालय परिसर में पार्किंग का दौर फिर लौट सकता है। अभी कोर्ट परिसर के ठीक पीछे होप मिल की जमीन पर नई पार्किंग संचालित हो रही है। रोजाना दो से ढाई हजार गाड़ियां यहां पार्क हो रही हैं। इस जमीन से पार्किंग को हटाने के लिए होप मिल प्रबंधन

.

इधर, मिल प्रबंधन ने हाई कोर्ट के आदेश की प्रति के साथ जमीन को खाली किए जाने को लेकर सीजीएम को आवेदन किया है। जमीन से पार्किंग हटाई गई तो वकील, पक्षकारों को फिर से कोर्ट परिसर में ही गाड़ियां लगाना होंगी। एमजी रोड पर इतनी संख्या में गाड़ियां लगाना संभव नहीं है।

अब सुप्रीम कोर्ट में हो सकती है अपील : अधिवक्ता संजय मेहरा का कहना है कि इस मामले में अब सरकार सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकती है। हाई कोर्ट में अधिवक्ता संघ इंटरविनर बना था। इसके तहत प्रकरण विचाराधीन रहने तक जमीन के कुछ हिस्से में पार्किंग संचालित करने की अनुमति दी गई थी। जिसे पार्किंग का कॉन्ट्रैक्ट मिला था, उसकी अवधि भी पूरी होने जा रही है। अब कॉन्ट्रैक्ट का नवीनीकरण भी संभव नहीं है। ऐसे में संभागायुक्त कार्यालय के परिसर में वकील, पक्षकारों की कार पार्किंग फिर से शुरू की जा सकती है। वहीं दो पहिया पार्किंग के लिए भी स्थान तय किया जा सकता है।

नई बिल्डिंग में डेढ़ साल : पीपल्याहाना में कोर्ट की नई बिल्डिंग बन रही है, लेकिन इसे पूरा होकर शुरू होने में करीब डेढ़ साल का वक्त है। इस बिल्डिंग के शुरू हो जाने पर पार्किंग की कोई दिक्कत नहीं होगी। अंडरग्राउंड पार्किंग की पर्याप्त व्यवस्था है। वहीं परिसर के बाहर भी पार्किंग रहेगी।

यह है मामला

याचिकाकर्ताओं ने कलेक्टर के 3 अक्टूबर 2012 के आदेश को कोर्ट में चुनौती दी थी। उनकी तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता एससी बागड़िया ने प्रस्तुत किया है कि यद्यपि याचिकाकर्ताओं को कोई कारण बताओ नोटिस जारी नहीं किया गया था, लेकिन वे स्वयं अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष उपस्थित हुए।

इसके बाद अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट द्वारा कोई आदेश पारित नहीं किया गया। इसके विपरीत कलेक्टर ने आदेश पारित कर जमीन को सरकारी होना बता दिया। सुनवाई का कोई अवसर दिए बिना आदेश पारित कर दिया गया। वहीं कलेक्टर की ओर से जवाब दिया गया कि याचिकाकर्ताओं को कोई नोटिस जारी नहीं किया था। कोर्ट ने फैसले में कहा कि याचिकाकर्ताओं को सुने बिना आदेश पारित किया गया था। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का घोर उल्लंघन है।



Source link