मध्यप्रदेश ने मातृ और शिशु स्वास्थ्य के मोर्चे पर कुछ सकारात्मक नतीजे जरूर हासिल किए हैं, लेकिन तस्वीर पूरी तरह संतोषजनक नहीं है। सैम्पल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) 2023 की ताजा रिपोर्ट बताती है कि प्रदेश की मातृ मृत्यु दर (MMR) में चार साल में 33 अंकों
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उप मुख्यमंत्री एवं स्वास्थ्य मंत्री राजेन्द्र शुक्ल ने कहा है कि स्वास्थ्य विभाग के केन्द्रित प्रयास अब परिणाम देने लगे हैं। उन्होंने दावा किया कि प्रदेश मातृ-शिशु मृत्यु दर कम करने की दिशा में सही राह पर है। आंकड़ों में सुधार स्वास्थ्य टीम की मेहनत का परिणाम है। आशा कार्यकर्ता, एएनएम, सीएचओ, नर्स, डॉक्टर और प्रशासक मिलकर लगातार काम कर रहे हैं। गांव-गांव काउंसलिंग, समय पर रेफरल और अस्पतालों में उपलब्ध सेवाओं ने हजारों जिंदगियां बचाई हैं।
चार साल में 33 अंकों की गिरावट SRS 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, मध्यप्रदेश की मातृ मृत्यु दर (MMR) 2019-21 के 175 से घटकर 2020-22 में 159 और अब 142 पर पहुंच गई है। यानी चार साल में 33 अंकों की गिरावट दर्ज हुई। हालांकि राष्ट्रीय औसत 88 की तुलना में यह अब भी बहुत अधिक है। देशभर में मातृ मृत्यु दर के मामले में एमपी की स्थिति सबसे खराब बताई गई है।
शिशु और बच्चों की मृत्यु दर में सुधार रिपोर्ट बताती है कि नवजात मृत्यु दर (NMR) 29 से घटकर 27 पर, शिशु मृत्यु दर (IMR) 40 से घटकर 37 पर और पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर (U5MR) 49 से घटकर 44 पर आ गई है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह सुधार संस्थागत प्रसव, आपातकालीन प्रसूति सेवाओं, खून चढ़ाने की सुविधा और एसएनसीयू-एनबीएसयू जैसे ढांचों के विस्तार के कारण संभव हुआ है।
दो नए मिशन से सुधार की उम्मीद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इसी साल अप्रैल में “मातृ-शिशु संजीवन मिशन” और “अनमोल 2.0 पोर्टल” की शुरुआत की थी। इसके तहत वर्ष 2030 तक मातृ मृत्यु दर को 80 प्रति लाख, नवजात मृत्यु दर को 10 प्रति हजार और शिशु मृत्यु दर को 20 प्रति हजार से कम करने का लक्ष्य रखा गया है।
गर्भवती महिलाओं की नियमित जांच हर माह की 9 और 25 तारीख को की जा रही है। पोषण किट, आयरन सप्लीमेंट और आवश्यक इंजेक्शन उपलब्ध कराए जा रहे हैं। चिह्नित अस्पतालों को एफआरयू के रूप में विकसित कर वहां एचडीयू/आईसीयू और एसएनसीयू/एनबीएसयू को मॉडर्न उपकरणों से सुसज्जित किया गया है।
डिजिटल टूल्स और नई योजनाएं अनमोल 2.0 और ई-पीएमएसएमए जैसे डिजिटल टूल्स से हाई रिस्क प्रेग्नेंसी की समय पर पहचान और प्रबंधन संभव हो रहा है। ई-रूपी और “यू कोट वी पे” योजनाओं से सोनोग्राफी और एनेस्थीसिया सेवाएं सुलभ हुई हैं। साथ ही टेलीमेडिसिन के जरिए विशेषज्ञ सेवाएं ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचाई जा रही हैं।
चुनौतियां अब भी बाकी सुधार के बावजूद चुनौतियां गंभीर हैं। ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच सीमित है। कुपोषण, देर से इलाज और अविकसित अधोसंरचना अब भी बड़ी बाधा हैं। किशोर स्वास्थ्य, पोषण और जनजागरूकता पर लगातार काम करने की जरूरत है।