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Balaghat News: बालाघाट जिला छत्तीसगढ़ से लगा हुआ है. ऐसे में यहां पर छत्तीसगढ़ी संस्कृति की झलक दिखती है. ऐसे में यहां पर मंडई और मेलों की परंपरा है, जैसी छत्तीसगढ़ में होती है. वहीं, आदिवासी बहुल जिला होने की वजह से यहां की आदिवासी परंपरा मंडई, मेलों में दिखती है.
मध्य प्रदेश के बालाघाट जिला छत्तीसगढ़ से लगा हुआ है. ऐसे में यहां पर छत्तीसगढ़ी संस्कृति की झलक दिखती है. ऐसे में यहां पर मंडई और मेलों की परंपरा है, जैसी छत्तीसगढ़ में होती है. वहीं, आदिवासी बहुल जिला होने की वजह से यहां की आदिवासी परंपरा मंडई, मेलों में दिखती है. दीवाली के बाद हर-गांव कस्बे में मंडई-मेले का आयोजन होता है, जहां पर गांव के देवों की पूजा होती और पारंपरिक नाच होता है.
इसमें आदिवासी समाज के लोग विशेष और पारंपरिक परिधान पहनते हैं.जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं. ऐसे में अब कान्हा नेशनल पार्क के लगा बगलीपाठ हैं, जहां पर होता है गांगों पूजन और अहीर नाच. ऐसे में हम आपको इस खास मेले के बारे में बता रहे हैं.
कान्हा किनारे गांव में लगता है अनोखा मेला
कान्हा नेशनल पार्क के किनारे एक मेला लगता है. इसका अपने आप में सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व है. बालाघाट में आदिवासियों के 12 पाठ है. जिसमें से एक है बगलीपाठ. उन 12 पाठों में आदिवासी समाज के देवता बसते हैं, जहां पर साल में एक बार खास पूजा होती है. ऐसी ही खास पुजा कान्हा नेशनल पार्क के किनारे स्थित बगलीपाठ में भी मेला लगता है. इस मेले की इतनी ख्याति है कि इसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं.
बगलीपाठ बाबा करते है मनोकामना पूरी
बगलीपाठ मेले में लोग सुबह-सुबह ही आ जाते हैं. पहले नदी में स्नान करते हैं फिर बगलीपाठ बाबा की पूजा अर्चना करते हैं. इसके बाद फिर लोग मेले का लुत्फ उठाते हैं. जो भी लोग बाबा के पास अपनी मनोकामना लेकर आते हैं वह जरूर पूरी होती है. आदिवासी विकास परिषद के अध्यक्ष दिनेश धुर्वे ने बताया कि साल 2013 में परसवाड़ा विधायक मधु भगत ने बगलीपाठ बाबा की पूजा-अर्चना की और चुनाव अभियान शुरू किया और उनकी मनोकामना पूरी हुई.
पहले गांगो पूजन फिर अहीर नाच
इस मेले में सर्व आदिवासी समाज के लोग आते हैं. साल भर उन्हें इस दिन का इंतजार रहता है. इसमें वह अपना गांगो लेकर आते हैं, जो खास डंडे और पत्तियों से बना होता है. पहले गांगो की पूजा की जाती है. फिर सभी लोग मिलकर नृत्य करते हैं. इसमें अहीर नाच, राउत नाचा और बैगा नाच होता है.