खंडवाः मध्य प्रदेश का निमाड़ इलाका लंबे समय से सोयाबीन, गेहूं, चना, कपास और प्याज की खेती के लिए जाना जाता है. यहां के ज्यादातर किसान पीढ़ियों से पारंपरिक फसलें ही बोते आए हैं. लेकिन खंडवा जिले के अहमदपुर खेगांव गांव के किसान महेश पटेल ने कुछ अलग सोचने का फैसला किया. यही सोच आज उनकी पहचान बन गई है और उनका नागपुरी संतरे का बगीचा दूर-दूर तक चर्चा में है.
संतरे की खेती से शुरू हुई कमाई
महेश बताते हैं कि पहले दो साल पौधों की देखभाल में मेहनत ज्यादा करनी पड़ी. गर्मी में समय पर सिंचाई, गोबर खाद का इस्तेमाल और खेत की साफ-सफाई पर खास ध्यान दिया गया. उन्होंने रासायनिक खाद की जगह गाय के गोबर और जैविक तरीकों को अपनाया. इसका फायदा यह हुआ कि पौधों की जड़ें मजबूत हुईं और बगीचा धीरे-धीरे तैयार होने लगा.
तीन साल तक उन्होंने पौधों के बीच पारंपरिक फसलें भी लीं, जिससे आमदनी बनी रही. चौथे साल से संतरे के पौधों में फल आना शुरू हो गया. पहले साल करीब 80 हजार रुपए की आमदनी हुई, दूसरे साल सवा दो लाख, तीसरे साल साढ़े सात लाख और चौथे साल आठ लाख रुपए तक का बगीचा बिक गया. साल 2024 में तो उन्होंने इसी बगीचे से करीब 10 लाख रुपए के संतरे बेचे.
घाटे की संभावना होती है कम
LOCAL 18 से बातचीत में महेश पटेल बताते हैं कि नागपुरी संतरे के बगीचे की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें घाटे की संभावना बहुत कम होती है. जब पौधे छोटे होते हैं, तब तक किसान दूसरी फसलें ले सकता है. एक बार पौधे फल देने लगें, तो हर साल उत्पादन बढ़ता जाता है. एक अनुमान के अनुसार, एक पौधे से एक कुंतल से ज्यादा संतरा मिल सकता है. संतरे के पौधों का जीवनकाल करीब 20 साल का होता है, यानी एक बार बगीचा तैयार हो जाए तो लंबे समय तक आमदनी मिलती रहती है.
पिछली बार उनके बगीचे में जब फूल आए, तभी व्यापारियों ने पूरा बगीचा खरीद लिया. साढ़े तीन एकड़ का बगीचा 10 लाख रुपए में बिक गया. अगर लागत निकाल दी जाए, तो करीब 7 लाख रुपए का शुद्ध मुनाफा हुआ. हालांकि, महेश बताते हैं कि पिछले साल मौसम ने थोड़ा धोखा दिया. गर्मी के समय बेवजह बारिश हो गई, जिससे फूल झड़ गए और उत्पादन हुआ नहीं. लेकिन अब फिर से पौधों पर अच्छा बौर आ रहा है और आगे बेहतर पैदावार की उम्मीद है.
महेश पटेल बगीचे की देखभाल को भी सफलता का बड़ा कारण मानते हैं. वे बताते हैं कि जड़ों की मजबूती के लिए गर्मी में खेत की जुताई जरूरी होती है.
पारंपरिक खेती से हट किया काम
2016 से पहले महेश भी आम किसानों की तरह पारंपरिक खेती ही करते थे, जिसमें एक एकड़ से करीब एक लाख रुपए तक का मुनाफा हो पाता था. लेकिन उन्होंने समय के साथ बदलाव को समझा और बागवानी की ओर कदम बढ़ाया. आज उनकी सफलता को देखकर आसपास के कई किसान जागरूक हुए हैं. कुछ किसानों ने अब संतरे और दूसरी फल फसलों की खेती शुरू भी कर दी है.
निमाड़ की जमीन में लहलहाता यह संतरे का बगीचा आज साबित करता है कि अगर सोच बदली जाए और मेहनत सही दिशा में हो, तो किसान भी खुशहाल बन सकता है.