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Ujjain News: महाकाल की नगरी उज्जैन में इन दिनों पर्यावरण प्रेमियों की चिंता लगातार बढ़ती जा रही है. दरअसल, शहर में विकसित किए गए एक लघु वन को स्थानांतरित कर वहां शासकीय संगीत महाविद्यालय की नई इमारत बनाने की तैयारी तेज़ हो गई है. यह वही लघु वन है, जिसे पर्यावरण प्रेमियों ने किसी सरकारी सहायता के बिना, अपने निजी खर्च और वर्षों की मेहनत से तैयार किया है.
धार्मिक नगरी उज्जैन में धर्म-कर्म के साथ पर्यावरण को भी विशेष महत्व दिया जाता है. लेकिन इन दिनों विकास और संवेदना आमने-सामने खड़ी दिखाई दे रही है. शहर में करोड़ों की लागत से शासकीय संगीत महाविद्यालय की भव्य इमारत बनाने की योजना है, लेकिन इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है उस लघु वन को, जिसे पर्यावरण प्रेमियों ने अपने खून-पसीने और निजी खर्च से सींचा है.
दरसल पूरे मामले की जानकारी देते हुए 68 वर्षीय पर्यावरण प्रेमी राजीव पाहवा ने बताया कि उन्हें एक फोन कॉल के जरिए 800 पेड़ों वाले लघु वन को ‘शिफ्ट’ करने की सूचना दी गई. कॉल करने वाले ने न तो अपनी पहचान बताई और न ही यह स्पष्ट किया कि किस विभाग से यह आदेश आ रहा है. उन्होने बताया ये पेड़ मेरे बच्चों की तरह हैं, इन्हें यूं उजाड़ने की बात सुनकर दिल कांप उठा. कालिदास अकादमी के पीछे स्थित पीजीबीटी कॉलेज परिसर की यह भूमि बीते ढाई वर्षों में हरियाली की मिसाल बन चुकी है.
शादी के बाद पेड़ों को माना अपना बच्चा
पर्यावरण प्रेमी राजीव पाहवा नें बताया मेरी उम्र 68 वर्ष है. मेरा जब विवाह हुआ था. जब मेने और धर्म पत्नी नें संकल्प लिया था. कि हम कभी अपने बच्चे नही करेंगे. क्युकि बच्चे आगे बड़े होकर समाज देश का नाम रोशन करे तो एक खुशी होती है. लेकिन अगर बच्चे कोई गलत परवरिश मे निकल जाए. तो उन्हें जन्म देने का कोई फायदा नही. इसलिए मेने और मेरी पत्नी नें पेड़-पौधों को ही अपना बच्चा मान लिया क्युकी यह इतने संस्कारी है. कि खुद मिट जाएंगे. लेकिन दुसरो को मिटने नही देंगे. क्युकि यह ऑक्सीजन देते हैं.
800 पेड़ो पर मंडरा रहा संकट
दरसल यहा रूपांतरण सामाजिक एवं जनकल्याण संस्था के सदस्यों ने 800 पौधे लगाए जो आज छांवदार पेड़ों का रूप ले चुके है. पर्यावरण प्रेमियों का दावा है कि जहां पहले से निर्माण के लिए जगह उपलब्ध थी, उसे छोड़कर अब जानबूझकर इसी लघु वन क्षेत्र को निशाना बनाया जा रहा है. राजीव पाहवा बताते हैं कि पिछले 10 वर्षों से वे पर्यावरण संरक्षण के लिए लगातार काम कर रहे हैं. उज्जैन में अब तक 6 से अधिक लघु वन उनकी संस्था के प्रयासों से खड़े हो चुके है. इस हरियाली को तैयार करने में बच्चे, छात्र-छात्राएं, व्यापारी, वकील और नौकरीपेशा लोग शामिल हैं, जिन्होंने अपनी जेब से पैसा खर्च कर पौधों को पेड़ बनाया है.
लघु वन से फेल रही है खुशबु
पर्यावरण प्रेमी निहारिका बताती हैं कि सिंहस्थ 2016 के बाद से यह अभियान लगातार चल रहा है. क्षिप्रा नदी किनारे और शहर की सड़कों पर अब तक करीब 5 लाख पौधे लगाए जा चुके हैं. जिन लघु वनों में कभी नन्हे पौधे थे, वहां आज हजारों पेड़ जीवनदायिनी ऑक्सीजन दे रहे हैं. लेकिन अब इस हरियाली पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं. पर्यावरण प्रेमियों को दो दिन का अल्टीमेटम मिलने की बात सामने आई है. उन्होने बताया पहले यहा जंगल था. अब यहा इन सुंदर पेड़ो की वजह से खुशबूदार फूल आ रहे है. जिससे वातावरण काफ़ी शुद्ध हो चूका है. यहा पहले जंगली जानवर देखने को मिलते थे.
संस्था से जुड़ी मेनका कहती है कि “अगर कोई हमारे इस लघु वन को उजाड़ने आएगा, तो हम चुप नहीं बैठेंगे. जरूरत पड़ी तो पेड़ों से लिपटकर चिपको आंदोलन करेंगे” वहीं, प्रोजेक्ट से जुड़े सब इंजीनियर का कहना है कि पेड़ों को नुकसान पहुंचाने का कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है और उन्हें गार्डन एरिया में शिफ्ट करने की योजना पर विचार किया जा रहा है. इस बीच मामला तब और संवेदनशील हो गया, जब स्थानीय सांसद द्वारा निर्माण कार्य शुरू करने से मना किए जाने की जानकारी सामने आई. पुलिस हाउसिंग बोर्ड द्वारा लिखे गए पत्र में स्पष्ट किया गया है कि निर्माण से पहले स्वामित्व की निर्विवाद भूमि उपलब्ध कराई जाए.