नई दिल्ली. इंडियन प्रीमियर लीग सिर्फ एक क्रिकेट टूर्नामेंट नहीं, बल्कि आज के भारत की सोच, महत्वाकांक्षा और जुनून का आईना बन चुकी है. मैदान पर जहां खिलाड़ी अपना सब कुछ झोंक देते हैं, वहीं मैदान के बाहर टीम मालिकों की भावनाएं, आस्था और बेचैनी इस लीग को और भी खास बना देती हैं. यह वही मंच है जहां बड़े-बड़े कारोबारी भी एक आम फैन की तरह दुआ करते नजर आते हैं और यही IPL की असली ताकत है.
आईपीएल की शुरुआत से ही कई टीम मालिकों और इंडस्ट्री लीडर्स को समझने का मौका मिलता है और करीब से देखने पर समझ आता है कि यह लीग उनके लिए क्या मायने रखती है. यही IPL की सफलता का सबसे बड़ा सबूत है. देश चलाने वाले ये लोग जब अपनी टीम के लिए बेचैन और भावुक नजर आते हैं, तो यह एक अलग ही तस्वीर पेश करता है.
हर किसी को चाहिए जीत का जायका
हर कोई IPL की इस “पाई” में हिस्सा चाहता है और हर कोई इसे जीतना चाहता है. यही वजह है कि IPL ने वह मुकाम हासिल कर लिया है, जो इससे पहले किसी भी क्रिकेट टूर्नामेंट ने नहीं किया. उदाहरण के तौर पर, एक टीम का पूरा सीनियर मैनेजमेंट मैच वाले दिन दोपहर 2 बजे होटल से निकलकर एक साथ पूजा करने जाता था. समय की पाबंदी और इस परंपरा के प्रति उनकी आस्था देखने लायक होती थी हालांकि टीम के नतीजे हमेशा उनके पक्ष में नहीं रहे.
भगवान की शरण में फ्रेंचाइजी
टीम मालिक जो बड़ी-बड़ी कंपनियां चलाते हैं अक्सर अपने बिजनेस मीटिंग्स में भी उतने तनाव में नहीं होते, जितने IPL मैच के दौरान नजर आते हैं. एक मालिक तो पूरे मैच के दौरान अपने इष्ट देवता की पुरानी तस्वीर को थामे रखते थे और हर विकेट या बाउंड्री पर उसे प्रणाम करते थे. आईपीएल का ओनर बॉक्स आधुनिक भारत की जटिलता को बखूबी दर्शाता है. यहां ब्रांडेड कपड़े, महंगी घड़ियां, लग्जरी कारें और हाई-टेक मोबाइल फोन आम बात हैं लेकिन जैसे ही मैच शुरू होता है, यही लोग आस्था से भरे, भगवान पर भरोसा रखने वाले भारतीय बन जाते हैं, जो अपनी टीम की जीत के लिए हर संभव दुआ करते हैं.
चाहे वे खुद कभी क्रिकेट खेले हों या नहीं, कई लोगों को लगता है कि उनकी प्रार्थनाएं मैच का नतीजा बदल सकती हैं. मैच से पहले खिलाड़ियों को प्रसाद दिया जाता है, हर तरह के टोटके अपनाए जाते हैं, यहां तक कि टीम का नाम और जर्सी का रंग भी ज्योतिष के अनुसार बदला जाता है. यही अनोखा फैनडम IPL को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से अलग बनाता है.
मालिक के लिए टीम हित सर्वोप्रिय
हालांकि प्रदर्शन के मामले में टीम मालिक बेहद सख्त होते हैं. यहां नाम या प्रतिष्ठा से ज्यादा मायने जीत का होता है “विनर टेक्स ऑल” इसका सबसे बड़ा उदाहरण कोलकाता नाइटराइडर्स है जब शाहरुख खान की टीम ने 2011 में सौरव गांगुली से अलग होने का फैसला किया, तो कोलकाता में भारी विरोध हुआ. कई लोगों ने कहा कि KKR अपनी फैन फॉलोइंग खो देगा और ईडेन गॉर्डेन में खाली स्टैंड देखने को मिलेंगे साथ ही यह भी माना गया कि गौतम गंबीर गांगुली की जगह कप्तान के रूप में सफल नहीं हो पाएंगे.
शुरुआत में कुछ मैचों में दर्शकों की संख्या कम भी रही, लेकिन जैसे ही टीम ने अच्छा प्रदर्शन करना शुरू किया, फैंस फिर से स्टेडियम में लौट आएऔर जब गंभीर की कप्तानी में टीम ने 2012 और 2014 में खिताब जीता, तो पुरानी सारी नाराजगी लगभग खत्म हो गई. यही IPL की असली पहचान है एक ऐसा मंच जो पूरी तरह व्यावसायिक, बेहद प्रतिस्पर्धी और जुनूनी फैंस से भरा हुआ है आने वाले दशक में इसकी लोकप्रियता और भी तेजी से बढ़ने की उम्मीद है.