भारतीय क्रिकेट का सबसे बड़ा ‘सरेंडर’, 9 ओवर में 47 रन और 7 विकेट बाकी

भारतीय क्रिकेट का सबसे बड़ा ‘सरेंडर’, 9 ओवर में 47 रन और 7 विकेट बाकी


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भारतीय क्रिकेट का सबसे बड़ा ‘सरेंडर’, 9 ओवर में 47 रन और 7 विकेट बाकी

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250 रनों के लक्ष्य का पीछा करते हुए भारतीय टीम ने 201 रन बना लिए थे 3 विकेट के नुकसान पर. तभी मैच पलटा क्योंकि 9 ओवर में टीम इंडिया को चाहिए सिर्फ़ 47 रन और 7 विकेट बाक़ी फिर भी टीम हार गई मैच. ये भारतीय क्रिकेट के वनडे इतिहास का सबसे बड़ा कोलैप्स था

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1997 के वेस्टइंडीज दौरे पर वनडे सीरीज के दौरान भारतीय बल्लेबाजों ने किया था सरेंडर

नई दिल्ली. क्रिकेट के इतिहास में 90 का दशक वेस्टइंडीज के दबदबे के ढलने और भारतीय क्रिकेट के नए सितारों के उदय का दौर था 1997 में जब भारतीय टीम वेस्टइंडीज के दौरे पर गई, तो प्रशंसकों को एक रोमांचक मुकाबले की उम्मीद थी. इस दौरे का तीसरा एकदिवसीय मैच सेंट विंसेंट के किंग्सटाउन स्थित अर्नोस वेल ग्राउंड पर खेला गया. यह मैच न केवल सीरीज के लिहाज से महत्वपूर्ण था, बल्कि इसने भारतीय बल्लेबाजों की कैरेबियाई पिचों पर संघर्ष की कहानी को भी बयां किया.

250 रनों के लक्ष्य का पीछा करते हुए भारतीय टीम ने 201 रन बना लिए थे 3 विकेट के नुकसान पर. तभी मैच पलटा क्योंकि 9 ओवर में टीम इंडिया को चाहिए सिर्फ़ 47 रन और 7 विकेट बाक़ी फिर भी टीम हार गई मैच. ये भारतीय क्रिकेट के वनडे इतिहास का सबसे बड़ा कोलैप्स था.  वेस्टइंडीज़ के गेंदबाज़ों ने किया कमाल और भारत 231 रन पर आलआउट हो गई. ये वहीं सीरीज थी जिसमें टेस्ट मैच में भारतीय टीम से 120 रन नहीं बने थे. इस दौरे के बाद सचिन तेंदुलकर ने कप्तानी से इस्तीफा दे दिया.

वेस्टइंडीज की पारी: स्टुअर्ट विलियम्स का प्रहार

टॉस हारकर पहले बल्लेबाजी करने उतरी वेस्टइंडीज की शुरुआत ठोस रही.  सलामी बल्लेबाज स्टुअर्ट विलियम्स ने शानदार 76 रनों की पारी खेलकर टीम को मजबूत आधार दिया. उन्हें दिग्गज ब्रायन लारा (33) और कार्ल हूपर (48) का अच्छा साथ मिला. भारतीय गेंदबाजों ने बीच के ओवरों में वापसी की कोशिश की, जिसमें कप्तान सचिन तेंदुलकर और एबे कुरुविला ने 2-2 विकेट झटके.  निर्धारित 50 ओवरों में वेस्टइंडीज ने 9 विकेट खोकर 249 रन बनाए.

भारत की रन चेज: संघर्ष और हार

250 रनों के लक्ष्य का पीछा करने उतरी भारतीय टीम की शुरुआत धीमी रही राहुल द्रविड़ और सौरव गांगुली जैसे बल्लेबाजों ने कोशिश तो की, लेकिन वेस्टइंडीज के तेज गेंदबाजी आक्रमण जिसमें कर्टली एम्ब्रोस, इयान बिशप और फ्रैंकलिन रोज़ शामिल थे जिन्होंने भारतीय बल्लेबाजों को खुलकर खेलने का मौका नहीं दिया.
भारतीय टीम अंतराल पर विकेट गंवाती रही.  मध्यक्रम में कुछ छोटी साझेदारियां हुईं, लेकिन कोई भी बल्लेबाज लंबी पारी खेलकर मैच फिनिश नहीं कर सका. पूरी भारतीय टीम 48.2 ओवरों में 231 रनों पर सिमट गई और वेस्टइंडीज ने यह मुकाबला 18 रनों से जीत लिया.
यह मैच वेस्टइंडीज की अपनी धरती पर पकड़ को दर्शाता था. भारत के लिए यह हार एक सबक की तरह थी कि कैरेबियाई परिस्थितियों में केवल तकनीक ही नहीं, बल्कि धैर्य की भी जरूरत होती है. आज भी 1997 के उस दौरे को सचिन तेंदुलकर की कप्तानी और भारतीय टीम के कड़े संघर्ष के लिए याद किया जाता है



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