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Sagar News: सागर जिले के रतौना गांव का 1920 का ऐतिहासिक सत्याग्रह आज भी याद किया जाता है. यहां अंग्रेजों की कसाई खाना खोलने वाली योजना का स्थानीय लोगों ने कड़ा विरोध किया था, जिसका नेतृत्व भाई अब्दुल गनी ने किया था. इस आंदोलन की गूंज देशभर में हुई और इसे अंग्रेजी शासन के खिलाफ एक महत्वपूर्ण सफलता माना जाता है.
Ratona Movement History: सागर जिले में वैसे तो 700 से अधिक ग्राम पंचायतें हैं लेकिन सागर भोपाल रोड पर एक गांव रतौना है. जो 100 साल पहले चर्चाओं में आया था सागर में हुए रतौना सत्याग्रह की दिल्ली कोलकाता तक गूंज सुनाई दी थी जिसके चलते ब्रिटिश काल में अंग्रेजों की नींद उड़ गई थी. अंग्रेजों के द्वारा यहां पर 1920 में गाय बैल काटने के लिए कसाई खाना खोला जा रहा था. जिसका विरोध होने के बाद अंग्रेजों को यहां पर देश भर में पहली शिकस्त मिली थी, जो सागर के साथ भारत वासियों के लिए भी बड़े गर्व की बात थी. इस आंदोलन का जमीनी नेतृत्व उस समय की 25 वर्षीय नवयुवक भाई अब्दुल गनी ने किया था.
100 साल पहले जिस गांव में खून की नदियां बहनी थी आज वही गांव गौ संरक्षण के लिए, गांव पालन के लिए, गौशालाओं के लिए जाना जाता है, यहां अब दूध की धारा बहती है. इस गांव में 80 साल पहले स्थापित किया गया वृहद पशु प्रजनन केंद्र है और यहां पर 1998 में यहां पर जिले की सबसे बड़ी गौशाला भी संचालित है, जो जिले में इसकी एक आम पहचान बनाते हैं. यहां पर 2023 में सागर शहर और मकरोनिया की डेरिया विस्थापित की जा रही हैं.
रतौना आंदोलन का ऐतिहासिक महत्व
रतौना आंदोलन का ऐतिहासिक महत्व इतना है कि इसे डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में एक यूनिट के रूप में बाकायदा पढ़ाया जा रहा है. इतिहास विभाग के प्रो. बीके श्रीवास्तव बताते हैं कि 1920 के लगभग की बात है डिब्बा बंद गौमास का निर्यात करने अंग्रेजों ने सागर में कसाई कल खोलने की प्लान बनाया था, जिससे वह चमड़ा और मांस निर्यात का व्यापार कर सकें. गौमांस कि यूरोप में डिमांड थी और इसको लेकर मेसर्स सेंट डेविड कंपनी को ठेका तक दे दिया गया था, कसाई खाना खोलें उन्होंने इश्तिहार भी जारी करवाए थे और वह हिंदू मुस्लिम एकता 1842 के बुंदेला विद्रोह और 1857 की क्रांति में देख चुके थे. वह चाह रहे थे कि मुसलमानों का विरोध ना हो, इस हिसाब से उन्होंने विज्ञापन दिया था लेकिन जमीनी स्तर पर आंदोलन शुरू करने के लिए सबसे पहले भाई अब्दुल गनी सामने आए, जिसे अंग्रेजों का दाव उल्टा पड़ गया.
भाई अब्दुल गनी ने स्पष्ट कह दिया कि एक भी गाय काटने से पहले मेरा सर आपको काटना होगा, उन्होंने जमीनी आंदोलन चलाया जब माखनलाल चतुर्वेदी खंडवा से मुंबई की यात्रा पर जा रहे थे. रास्ते में उन्होंने समाचार पत्र में देखा जिसका विज्ञापन छपा हुआ था जैसे ही विज्ञापन पड़ा तो उन्होंने 40 गांव की यात्रा स्थगित कर दी. स्टेशन से उतरकर सीधा जबलपुर आ गए और फिर उन्होंने अपने कर्मवीर समाचार पत्र के माध्यम से विरोध शुरू किया. भाई अब्दुल गनी और सागर की अन्य लोग शामिल हो गए. उस समय कर्मवीर समाचार पत्र काफी प्रसिद्ध था. उसके माध्यम से माखनलाल चतुर्वेदी ने दो काम किया. एक तो समाचार पत्र के माध्यम से जन जागृति फैले विरोध प्रकट किया और दूसरा पंडित मदन मोहन मालवीय से मिले लाला लाजपत राय से मिले जो उस समय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष थे.
वंदे मातरम पत्र में 51 लेख लिखें
जब लाला लाजपत राय को इसके बारे में पता चला तो उन्होंने भी अपने वंदे मातरम पत्र में 51 लेख लिखें. इधर अंग्रेजों ने लगभग पूरी तैयारी कर ली थी. तालाब का निर्माण करवा दिया था रेलवे लाइन डाल दी थी, लेकिन जब उनको पता चला की 1920 कांग्रेस का असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव है. अंग्रेजों को लगा कहीं ऐसा ना हो की गाय को हिंदू अत्यधिक रूप से पूजते हैं. मां के रूप में मानते हैं तो उन्होंने तुरंत तार भेज कर कहा कि हमने रतौना कसाई खाना खोलने की योजना त्याग दी है. इस प्रस्ताव को कांग्रेस के अधिवेशन में ना रखा जाए.
एक तरह से यह है जमीनी आंदोलन में भाई अब्दुल गनी की जीत थी तो पत्रकारिता में माखनलाल चतुर्वेदी की विजय थी. यह ऐसा आंदोलन था कि अखिल भारतीय स्तर पर पहली बार अंग्रेजों को सागर की धरती पर शिकस्त मिली थी. अंग्रेजों ने पूरे देश में जहां जो चाहा वह किया लेकिन सागर का यह सबसे बड़ा महत्व है की यहां की धरती पर जो उनका प्रयास था, वह निष्फल रहा.
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Deepti Sharma, currently working with News18MPCG (Digital), has been creating, curating and publishing impactful stories in Digital Journalism for more than 6 years. Before Joining News18 she has worked with Re…और पढ़ें