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Balaghat News: जंगली भैंसा सिर्फ एक शाकाहारी वन्यजीव नहीं है, वह जंगल का इंजीनियर है. ये अपनी गतिविधियों के जरिए पर्यावरण को सक्रिय आकार देते हैं यानी कि पारिस्थितिकी तंत्र का पुनर्निर्माण भी करते हैं.
बालाघाट. मध्य प्रदेश के बालाघाट में कान्हा नेशनल पार्क अपनी विविधता के लिए जाना जाता है. सदियों से यह जंगल कई वन्य प्राणियों का बसेरा रहा है लेकिन वक्त के साथ जंगल की व्यवस्था बदली और वन्य प्राणी के अनुकूल नहीं रही. नतीजतन कई वन्य प्राणी विलुप्ति के कगार पर चले गए. एक ऐसा ही पशु था, जो कभी कान्हा के जंगलों में खो सा गया था लेकिन अब लगभग एक शताब्दी के बाद जंगल में वापसी कर रहा है. हम बात कर रहे हैं जंगली भैंसे की. एक वक्त था जब कान्हा नेशनल पार्क के जंगल में ये अच्छी संख्या में मौजूद थे लेकिन अब से करीब डेढ़ दशक पहले ही यह विलुप्त होना शुरू हुए और बिल्कुल खत्म हो गए. अब कान्हा में जंगली भैंसों की बसाहट शुरू करने की कवायद शुरू हुई है. असम के काजीरंगा नेशनल पार्क से 50 जंगली भैंसे लाने के लिए दोनों राज्य सरकारों ने करार किया. मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इसकी शुरुआत में चार जंगली भैंसों को बालाघाट के कान्हा नेशनल पार्क के सुपखार स्थित बाड़े में छोड़ा है.
मध्य प्रदेश में जंगली भैंसें नहीं थे. अब ये सिर्फ मुख्य रूप से असम में सीमित हैं जबकि छत्तीसगढ़ में इनकी संख्या बिल्कुल कम है. भारतीय वन्यजीव संस्थान देहरादून की स्टडी में यह सामने आया कि कान्हा टाइगर रिजर्व जंगली भैंसों के पुनर्स्थापन के लिए सबसे बेहतर है. ऐसे में 50 जंगली भैंसों के फिर से बसाने की तैयारी की जा रही है. वहीं 8 जंगली भैंसों को मानसून से पहले ही यहां छोड़ा जाना है.
दो दिन में 2000 किलोमीटर का सफर
खटिया गांव के रहने वाले संतोष सिंह ठाकुर लोकल 18 को बताते हैं कि चार जंगली भैंसों को लाने में 48 घंटे का समय लगा. पशुओं का समस्या न हो, इसलिए लगातार सफर करना था. वह 25 अप्रैल को निकले थे. बिने रुके दिन-रात करीब 2000 किलोमीटर का सफर तय कर वह कान्हा नेशनल पार्क पहुंचे.
जंगल का इंजीनियर है जंगली भैंसा
मुख्य वन्य प्राणी संरक्षक ने बताया कि जंगली भैंसा सिर्फ एक शाकाहारी वन्यप्राणी नहीं है. दरअसल वह जंगल का इंजीनियर है. वह अपनी गतिविधियों के जरिए पर्यावरण को सक्रिय आकार देता है यानी कि भैंसा पारिस्थितिकी तंत्र का पुनर्निर्माण भी करता है. जंगली भैंसें पानी और कीचड़ में लोटना पसंद करते हैं, जो छोटे-छोटे तालाब बनाती है और यही उभयचर वन्यप्राणियों के लिए आश्रय स्थल का काम करते हैं. ये घास के मैदान को साफ रखते हैं, जिससे झाड़ियां नहीं पनपती हैं. वहीं ये जंगली भैंसें भारी मात्रा में वनस्पति खाते हैं और चलते-फिरते बीजों को एक जगह से दूसरे स्थान पर फैलाते हैं, जिससे जंगल के पुनर्जनन में मदद मिलती है.
क्या बायसन और जंगली भैंस एक है?
आपके मन में भी एक सवाल अक्सर उठता होगा कि क्या बायसन और जंगली भैंस एक है, तो इसका जवाब है नहीं. दरअसल बायसन गोवंश की जंगली प्रजाति है. इसके घुटने के नीचे सफेद रंग होता है. वहीं जंगली भैंस एशियाई जंगली भैंस (Bubalus Arnee) है. ऐसे में दोनों में काफी अंतर है.
असम से आए मेहमानों की होगी मेहमाननवाजी
असम से आए जंगली भैंसों को कान्हा नेशनल पार्क के बोमा नामक बाड़े में रखा गया है. वे खुद को यहां के वातावरण में ढालेंगे. कुछ समय बाद उन्हें जंगल में खुला छोड़ दिया जाएगा. इससे पहले बाड़े में उनके भोजन के लिए पर्याप्त व्यवस्था रहेगी. वहीं डॉक्टर की टीम निगरानी भी रखेगी. उनपर लगातार निगरानी के लिए वॉच टावर भी बनाया गया है, जहां तीन लोगों की टीम लगातार मौजूद है.
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राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.