Khandwa News: न पैसे लेते, न प्रचार… फिर क्यों कर रहे हैं ये लंबी यात्रा? वजह कर देगी हैरान!

Khandwa News: न पैसे लेते, न प्रचार… फिर क्यों कर रहे हैं ये लंबी यात्रा? वजह कर देगी हैरान!


खंडवा में जब लोग सुबह उठे तो किसी को अंदाज़ा नहीं था कि एक अनोखा मेहमान उनकी धरती पर कदम रख चुका है. धीरज गोपाल महाराज, जो पिछले 18 साल से बिना रुके पैदल चल रहे हैं, सिर्फ एक उद्देश्य लेकर गौमाता की सेवा और सनातन संस्कृति का प्रचार.

2005 में शुरू हुई यात्रा, जो अब 2043 तक जारी रहेगी

ये कोई छोटी यात्रा नहीं, बल्कि एक जीवन समर्पण है. 4 दिसंबर 2005 को राजस्थान के हल्दीघाटी से शुरू हुई ये यात्रा, अब तक 1 लाख किलोमीटर से ज़्यादा तय कर चुकी है. लक्ष्य है 2043 तक देश के हर गांव में पहुंचकर गौ सेवा और सनातन धर्म का संदेश देना.

हर गांव, हर दिल में बस एक संदेशगौमाता जीवन का आधार हैं’

अब तक ये यात्रा 45,000 से भी ज्यादा गांवों में पहुंच चुकी है. जहां-जहां ये संत गए, वहां उन्होंने बताया कि गौ सेवा सिर्फ आस्था नहीं, बल्कि पर्यावरण और स्वास्थ्य दोनों के लिए वरदान है.

दान लेते हैं, न प्रचार करते हैं फिर भी पूरा देश जुड़ रहा है

इस यात्रा की सबसे बड़ी बात ये है कि कोई चंदा नहीं लिया जाता.भोजन, रहना और इलाज की व्यवस्था गुरुदेव की ओर से होती है. संपूर्ण यात्रा निष्काम सेवा है, यानी बिना किसी स्वार्थ के

111 गौशालाएं बनवा चुके हैं इनके गुरुदेव

धीरज गोपाल महाराज के गुरुदेव संत श्री ने अब तक राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और कर्नाटक में 111 गौशालाएं स्थापित करवा दी हैं, जहां बीमार, बेसहारा और लावारिस गायों की सेवा होती है.

पदयात्रा नहीं, एक सामाजिक आंदोलन बन चुका है ये मिशन

खंडवा पहुंचने पर स्थानीय लोगों ने भव्य स्वागत किया, उन्हें आश्रय दिया और उनके विचारों से प्रेरित होकर गौ सेवा का संकल्प लिया. ये अब सिर्फ एक यात्रा नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक जागृति का अभियान बन चुका है, जो और ये यात्रा अभी रुकी नहीं है… आगे महाराष्ट्र, फिर पूरा भारत. मध्य प्रदेश में 2 साल रुकने के बाद अब यात्रा महाराष्ट्र की ओर बढ़ रही है. हर राज्य में लगभग 2 वर्ष तक पदयात्रा की जाती है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा गांवों तक पहुंचा जा सके.

संघर्ष नहीं सेवा, प्रचार नहीं तपस्या, यही है इस पदयात्रा की आत्मा

धीरज गोपाल महाराज का यही संदेश हर जगह गूंज रहा है गौ माता सिर्फ पूजा की चीज़ नहीं, वो हमारी ज़िंदगी और प्रकृति का संतुलन हैं,”



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