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शिवपुरी जिले के पिपरो क्षेत्र में रहने वाले कुम्हार गुड्डा प्रजापति वर्षों से मटके बनाने का काम कर रहे हैं. उनके हाथों की लय, चाक की गति और मिट्टी की समझ इस परंपरागत कला की जीवंत मिसाल है. वे बताते हैं कि मटका बनाना केवल काम नहीं, बल्कि एक साधना है, जिसमें धैर्य, अनुभव और प्रकृति की समझ की जरूरत होती है.
गर्मी का मौसम आते ही शिवपुरी के गांव–कस्बों में एक चीज़ फिर से घरों की शान मिट्टी का मटका बन जाती है. बिना बिजली, बिना फ्रिज और बिना किसी आधुनिक संसाधन के, यही साधारण सा दिखने वाला घड़ा हमें ठंडा, मीठा और सुकून देने वाला पानी देता है. अक्सर मन में सवाल उठता है कि आखिर इस मटके में ऐसा क्या जादू है कि भीषण गर्मी में भी इसका पानी फ्रिज जैसा ठंडा लगता है? इस सवाल का जवाब छिपा है. मिट्टी, मेहनत और आग की उस लंबी प्रक्रिया में जिससे गुजरकर एक साधारण मिट्टी का ढेला मटका बनता है.
शिवपुरी जिले के पिपरो क्षेत्र में रहने वाले कुम्हार गुड्डा प्रजापति वर्षों से मटके बनाने का काम कर रहे हैं. उनके हाथों की लय, चाक की गति और मिट्टी की समझ इस परंपरागत कला की जीवंत मिसाल है. वे बताते हैं कि मटका बनाना केवल काम नहीं, बल्कि एक साधना है, जिसमें धैर्य, अनुभव और प्रकृति की समझ की जरूरत होती है.
शिवपुरी में घर-घर तैयार होता है मिट्टी के मटके
मटके की शुरुआत सही मिट्टी के चयन से होती है. यह कोई भी मिट्टी नहीं होती. इसके लिए खास चिकनी और महीन मिट्टी चुनी जाती है, जो आसानी से आकार ले सके. मिट्टी लाने के बाद उसे कई घंटों तक पानी में गलाया जाता है. फिर उसे पैरों से मसल-मसल कर गूंथा जाता है, ताकि उसमें हवा की जेबें न रहें और कोई कंकर-पत्थर भी न बचे. यह प्रक्रिया बेहद जरूरी है, क्योंकि यदि मिट्टी में कण रह जाएं तो मटका पकने के समय फट सकता है.जब मिट्टी पूरी तरह तैयार हो जाती है, तब उसे पत्थर के बने चाक पर रखा जाता है. तेज गति से घुमाया जाता है. कुम्हार अपने अनुभवी हाथों से मिट्टी को ऊपर उठाते हुए गोल आकार देता है. धीरे-धीरे मिट्टी का ढेला मटके का रूप लेने लगता है. यह दृश्य देखने लायक होता है.घूमते चाक पर कुम्हार की उंगलियां जैसे मिट्टी में जान फूंक देती हैं.
मटके के लिए शुरुआत में मिट्टी के चयन
आकार देने के बाद मटके को कुछ समय के लिए धूप में सूखने रखा जाता है. जब वह थोड़ा सख्त हो जाता है, तब उसे फिर से ठोक-पीटकर, खुरचकर और चिकना कर अंतिम आकार दिया जाता है. इस दौरान उसकी मोटाई, संतुलन और मुंह की गोलाई को ठीक किया जाता है. फिर मटकों को कतार में रखकर पूरी तरह सूखने दिया जाता है. गुड्डा प्रजापति बताते हैं कि यही वह चरण है, जो तय करता है कि मटका कितना मजबूत और कितना ठंडा पानी देगा. सूखे मटकों को ईंटों की भट्टी में लकड़ी और उपलों की आग में कई घंटों तक तपाया जाता है. आग की गर्मी मिट्टी के कणों को आपस में मजबूती से जोड़ देती है. जितना ज्यादा और संतुलित तपेगा, मटका उतना ही मजबूत और प्रभावी बनेगा.
मटके की दीवारों में होता है सूक्ष्म छिद्र
मटके की दीवारों में सूक्ष्म छिद्र होते हैं. जब उसमें पानी भरा जाता है, तो बहुत ही हल्की मात्रा में पानी इन छिद्रों से बाहर आता है.वह वाष्पित हो जाता है. इस वाष्पीकरण की प्रक्रिया में ऊष्मा खर्च होती है, जिससे अंदर का पानी ठंडा हो जाता है. यही प्राकृतिक प्रक्रिया मटके के पानी को ठंडा, ताजा और स्वादिष्ट बनाती है. गर्मी के मौसम में मटके का पानी केवल प्यास ही नहीं बुझाता, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माना जाता है. इसमें न तो फ्रिज जैसी अत्यधिक ठंडक होती है, न ही गले को नुकसान पहुंचाता है। ग्रामीण अंचलों में आज भी लोग मटके का पानी पीना ज्यादा पसंद करते हैं.